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Thursday, 25 January 2018

125-शुभ गणतन्त्र दिवस !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

जीवन की पाठशाला और समय जैसा शिक्षक ! यहाँ जैसे पाठ सीखने को मिलते हैं वैसे  किसी        पाठ्यक्रम की कोई सी पुस्तक में नहीं  हमें साथ लेकर पल-पल आगे बढ़ता यह समर्थ शिक्षक पथ में मिलते भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति वाले सहयात्रियों ,छोटी-बड़ी घटनाओं, खट्टे- मीठे अनुभवों के माध्यम से जीवन की उलझनों और उनके समाधान की ओर इंगित करता है  अब यह हम पर निर्भर है कि हम कितना समझते हैं इन इशारों को !

गया वर्ष भी कुछ ऐसे ही संकट और समाधान दे गया  विगत दिनों दो घटनाएँ घटीं , जो आपके साथ साझा करना जरूरी लगा  सुबह की नियमित सैर से लौटते हुए बड़ा रोचक दृश्य दिखाई दिया  बीच सड़क एक गाड़ी रुकी खड़ी थी  नशे में टुन्न चार युवा चारों तरफ से पूरे जोश के साथ धक्का देने में लगे थे , एक आगे से पीछे ,दूसरा पीछे से आगे , एक बाएँ से दाएँ और एक दाएँ से बाएँ ..अजब नज़ारा था , गाड़ी भी हैरान-परेशान होगी , जाऊँ तो किधर जाऊँ ? खूब भीड़ इकठ्ठा थी ,जैसे मज़मा लगा था  लोग मजे ले रहे थे कि किसी ने पूछा , “अरे भाई क्या हुआ” तो एक बोला , “जी मानव  दी गड्डी नू जाने की होया” और लगा धक्का मारने  तभी किसी ने पुलिस को फोन कर दिया और फिर वही हुआ जो होना था  मैं भी लपककर आगे चल दी , देर जो हो गई थी 

अभी एक-दो कदम ही चली थी कि सामने से वर्मा जी रुआँसे से चले  रहे हैं  बोले , क्या बहन जी ! आपका शहर भी निरा चौपट नगरी ही है ।”
क्या हुआ पूछा तो बोले , “अरे , परसों हमारे बेटे के जन्मदिन का समारोह था ,  पता नहीं कहाँ से कुछ लोग आए और हमारे अम्मा-पिता जी को ढेरों गालियाँ सुना गए” 
ओहो बड़ा पचड़ा हुआ , आपने तो खूब ठोक दिया होगा ?
नहींनहीं जी हम कहाँ कुछ कह पाए ,वर्मा जी बोले 
क्यों , गालियाँ देकर भाग गए थे क्या वो लोग ?
नहीं जी , कितनी देर हाथ नचा-नचा कर सुनाते रहे 
ओहो! आप अकेले थे क्या ? हमने फिर पूछा। अजी कहाँ ,सारे रिश्तेदारों के सामने बड़ी बेइज्जती हुई 
वर्मा जी , बहुत सारे लोग थे क्या वो ? नहीं जी चार-पाँच थे  फिर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई ? पूछा तो बोले , “नहीं जी , किसके खिलाफ कराएँ , मुँह तो ढके थे उनके  बस राम ही राखे अब ऐसी चौपट व्यवस्था को , ..संविधान ने हमें भी कुछ अधिकार दिए हैं ; लेकिन क्या कहिए .. किसी काम के नहीं ये लोग ...
बड़बड़ाते हुए वर्मा जी तो निकल गए;  लेकिन दोनों ही घटनाएँ मुझे बड़े सोच में डाल गईं  नए वर्ष में गणतंत्र-दिवस की शुभ बेला पर कुछ लिखने का मन था  कितनी सुन्दर कल्पनाएँ , स्वप्न तैयार थेलेकिन आज के भ्रमण ने दो ही बातें शेष रहने दीं  पहली- पदपैसा और ताकत के नशे में चूर ‘कुछ’ लोग आज सम्पूर्ण विश्व में परस्पर प्रेम , सौहार्द , मानवता के विकास की गाड़ी के आगे अड़े खड़े हैं  नए वर्ष में नए संकल्पों के साथ इस नशे से मुक्ति पाएँ और विकास की गाड़ी आगे बढाएँ  दूसरी  संविधान द्वारा अधिकारों के साथ दिए गए अपने कर्तव्यों पर भी गौर फरमाएँ और अपने गणतंत्र को मजबूत बनाएँ  इन्हीं शब्दों के साथ भारतीय गणतंत्र एवं समस्त भारतवासियों को इस पावन अवसर पर हार्दिक   शुभकामनाएँ !!


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Saturday, 18 November 2017

121-आधुनिक भारत के शिल्पी : सरदार वल्लभ भाई पटेल


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

अदालत में अपने मुकदमे की पैरवी करते वकील साहब के हाथ में किसी ने एक पत्र पकड़ा दिया । उन्होंने एक नज़र पढ़ा और जेब में रख लिया । लगभग दो घंटे बहस चली और वे मुकदमा जीत गए । बाद में न्यायालय में उपस्थित न्यायाधीश महोदय एवं अन्य अधिवक्ताओं को पता चला कि वकील साहब की पत्नी के देहाँत का समाचार था । व्यथित वकील साहब से इस विषय में पूछने पर उन्होंने कहा , “उस समय मैं अपना फ़र्ज़ निभा रहा था ,जिसका शुल्क मेरे मुवक्किल ने न्याय के लिए मुझे दिया था ,मैं उसके साथ अन्याय कैसे कर सकता था ।” यह कर्त्तव्यनिष्ठ, दृढ़चरित्र, न्यायप्रिय अधिवक्ता और कोई नहीं हमारे आज़ाद भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री, गृह, सूचना तथा रियासत विभाग के मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल थे ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म दिनाँक 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नडियाद के एक कृषक परिवार में हुआ था । पिता झावेरभाई पटेल और माता लाडबाई पटेल की वह चौथी संतान थे । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कारसमद में हुई । सन 1897 में मैट्रिक और 1900 में जिला अधिवक्ता की परीक्षा उतीर्ण की । गंभीर , शालीन और धुन के धनी सरदार पटेल ने अपनी शिक्षा–दीक्षा कठिन संघर्ष के साथ पूरी की । सन 1905 में बैरिस्टर कोर्स करने के लिए इकट्ठे किए पैसों से अपने बड़े भाई बिट्ठल भाई को इंग्लैण्ड पढ़ने भेज दिया । बाद में सन 1910 में स्वयं भी इंग्लॅण्ड जाकर ‘मिडिल टेम्पल’ में लॉ की पढाई के लिए प्रवेश ले लिया । वहाँ  आधी समयावधि में प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण करके  50 पौंड का ईनाम पाया । जनवरी 1913 में बैरिस्टर बने और फरवरी 1913 में भारत लौटकर वकालत प्रारम्भ कर दी । थोड़े समय में ही निपुण अधिवक्ता के रूप में विख्यात हो गए । इनकी पत्नी का नाम झावेरबाई ,पुत्री मणिबेन और पुत्र का नाम डाहिया भाई पटेल था ।

महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित पटेल आज़ादी के आन्दोलन में कूद पड़े । सन 1920 में ‘असहयोग आन्दोलन’ में विदेशी कपड़ों की होली जलाई । फसलों की बर्बादी से बदहाल खेड़ा जनपद के किसानों की कर में छूट की माँग को अंग्रेजों ने अस्वीकार कर दिया था । सरदार पटेल ने गाँधी जी एवं अन्य नेताओं के साथ किसानों का नेतृत्व कर अंग्रेजी सरकार को कर में छूट देने के लिए बाध्य कर दिया । सन 1928 में बारडोली के सशक्त, सफल सत्याग्रह के बाद उन्हें वहाँ  की जनता के द्वारा “बारडोली का सरदार” की उपाधि प्रदान की गई ,जिसे बाद में सारे देश ने ‘ सरदार’ के रूप में स्वीकार किया । उसके बाद से आज़ादी के आन्दोलन में सक्रिय पटेल अनेक बार जेल गए । सन 1930 में ‘नमक सत्याग्रह’ में पटेल को 3 माह की कैद हुई । सन 1932 में ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ में पुनः गिरफ्तार होकर गाँधी जी के साथ यरवदा जेल में रहे ,जहाँ से जुलाई 1934 में रिहा हुए । अक्टूबर 1940 में कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ पटेल भी गिरफ्तार हुए और अगस्त 1941 में रिहा हुए । ‘भारत छोडो’ आन्दोलन में अगस्त 1942 से सन 1945 तक पटेल जेल में रहे ।

त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति पटेल ने आज़ादी की लड़ाई में तन्मयता से भाग लेकर भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ से स्वयं को दूर रखा । आजाद भारत में अपने दायित्वों का सफलता पूर्वक निर्वहन किया । गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल की प्राथमिकता भारत की बिखरी हुई रियासतों के एकीकरण के साथ सुदृढ़ , सशक्त भारत के निर्माण की थी । जिसके लिए उन्होंने दूरदर्शिता पूर्वक आजादी से ठीक पूर्व ही पी.वी. मेनन के साथ मिलकर प्रयास प्रारंभ कर दिये थे । जिनके परिणाम स्वरुप हैदराबाद , जूनागढ़ और कश्मीर रियासतों को छोड़कर प्रायः सभी रियासतों ने भारत में स्वेच्छा से विलय स्वीकार किया । विरोध से डरकर जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया और हैदराबाद रियासत के लिए ‘आपरेशन पोलो’ के अंतर्गत सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण कराया ।

सामाजिक क्षेत्र के अन्य कार्यों में पटेल ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण , गाँधीस्मारक निधि की स्थापना , कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि कार्य भी विशेष रूचि के साथ किए । गाँधी जी के साथ मिलकर गुजरात विद्यापीठ स्थापित करने का निर्णय लिया । जिसके लिए बाद में रंगून से 10 लाख रुपये भी एकत्र किए ।
गोआ पर उनके दृष्टिकोण का पता इस प्रसंग से चलता है – भारतीय युद्धपोत से यात्रा करते हुए पटेल गोआ के निकट पहुँचे । वांछित सैन्य -शक्ति का जायजा लेकर पटेल ने अफसरों को गोवा पर अधिकार करने का आदेश दे दिया । अफसरों द्वारा लिखित आदेश दिए जाने की विनती करने पर संवैधानिक दृष्टि से विचार करते हुए उस समय लौट आए । इसी प्रकार लक्षद्वीप समूह पर दूरदर्शिता से काम लेते हुए भारतीय नौसेना के एक जहाज को तुरंत वहाँ भारतीय ध्वज फहराने भेज दिया । उसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तानी नौसेना के जहाज लक्षद्वीप के निकट देखे गए , जो भारतीय ध्वज देखकर वापस लौट गए ।

सरदार पटेल को लगभग 56रियासतों के भारत में एकीकरण के अविस्मरणीय योगदान तथा अन्य कड़े निर्णयों के लिए ‘लौह पुरुष’ और ‘भारत का बिस्मार्क’ जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया । उनके जीवन काल में ही उन्हें नागपुर, बनारस तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालयों द्वारा क्रमशः 3, 25 एवं 27 नवम्बर ,1948 को ‘डॉ. ऑफ़ लॉ’ की उपाधि से सम्मानित किया गया । 26 फरवरी 1948 को उस्मानिया वि.वि. ने भी ‘डॉ. ऑफ़. लॉ’ की उपाधि प्रदान की तथा मरणोपरांत वर्ष 1991 में सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार ‘ भारत रत्न ‘ से अलंकृत किया ।  सरदार पटेल दूरदर्शी  राजनेता थे।उन्होंने 1950 में नेहरू जी को पत्र लिखकर चीन की तिब्बत नीति के कपट  के बारे में  सजग किया था , जिस पर उस समय ध्यान नहीं दिया गया।

यद्यपि भारत माता के इस कुशल कूटनीतिज्ञ, दूरदर्शी , तेजस्वी , दृढ़ चरित्र सपूत का मुम्बई ( तत्कालीन बम्बई ) में 15 दिसम्बर , 1950 को हृदयाघात से निधन हो गया तथापि आधुनिक भारत के शिल्पी के रूप में वे हमारे हृदयों में सदैव अमर रहेंगे । 
- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
 


Tuesday, 3 March 2015

चुनमुन की होली !



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

आज सभी तैयारियों में व्यस्त थे | गुजरात आने के बाद लगभग ५-६ साल के बाद इस साल होली पर अपने गाँव उत्तर प्रदेश जाने की तैयारी थी | चुनमुन का मन उत्साह से भरा था |बार-बार माँ से पूछता क्या-क्या सामन रख लूँ ?और माँ मुस्कुरा देतीं |जैसे-तैसे जाने का दिन आया और शाम की ट्रेन से दिल्ली की ओर प्रस्थान किया | सारे रास्ते चुनमुन को चैन नहीं | ढेर बातें माँ से पूछता ,कैसे होंगें सब वहाँ ? आपने रंग रखे कि नहीं? आप होली कैसे खेलते थे वहाँ ? क्या-क्या बनाओगी ? वगैरह | अब माँ ने पूछा ,"अच्छा चुनमुन बताओ होली से क्या समझते हो ? क्यों मनाई जाती है होली ?” चुनमुन चकित यह माँ क्या पूछ रहीं हैं होली मतलब खूब रंगों से हुडदंग मचाना,अच्छे-अच्छे पकवान खाना और हाँ पहले से लकडियाँ इकट्ठा कर बनाई गई होली को प्रज्ज्वलित कर उसकी पूजा करना |यह फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है क्योंकि इसी दिन भक्त प्रह्लाद की बुआ होलिका का दहन हुआ था | सब तो पता है उसे |
माँ मुस्कुराईं और बोली बैठो ! अभी दिल्ली दूर है ,मैं तुम्हें कुछ और बातें बताती हूँ होली के विषय में | भक्त प्रह्लाद और होलिका के साथ-साथ और भी बहुत सी बातें होली के साथ जुड़ी हैं | माँ ने बताया कि हमारे पूर्वजों ने विविध योग , तप ,अध्ययन – मनन से प्राप्त अनुभवों और ज्ञान को व्रत ,उत्सव ,त्यौहारों आदि के रूप में मनाने का विधान किया | तथा ऋतुओं एवं मौसम के अनुरूप हमारा आचरण ,खान-पान कैसा हो यह भी बताया | समाज के लिए कुछ हितकारी घटनाओं को भी त्यौहारों के रूप में मनाए जाने की परम्परा प्रारम्भ की |ऐसा ही एक त्यौहार होली है | उन्होंने प्रह्लाद एवं होलिका के प्रसंग के साथ राक्षसी ढूंढा की कथा ,पूतना-वध ,महादेव द्वारा कामदेव को भस्म किए जाने की कथा को भी होली से जुड़ा बताया |प्रथम पुरुष मनु के जन्म की तिथि भी यही थी | वैदिक काल में इसी दिन से नए अन्न को यज्ञ – हवन में होम कर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता था | जिस परम्परा को आज भी गन्ने में जौ की बालियाँ बाँध कर होली में भून कर खाने के रूप में निभाया जाता है |
कथाएँ सुनते – सुनते उसे नींद आ गई | सुबह आँख खुली तो मथुरा आ गया था | कुछ समय बाद दिल्ली ...वहां से बस पकड़कर गाँव पहुँच गए | खुशी-खुशी चुनमुन ने माँ-पापा और दीदी के साथ सभी बड़ों के चरण छूकर अभिवादन किया तो सबने उसे प्यार से गले लगा लिया |अब तो उमंग की सीमा न थी | वह तो तुरंत सब से मिलने बाहर निकल गया | माँ और दीदी चाची जी ,दादी जी ,ताई जी से बतियाने में व्यस्त हो गईं | शाम होते-होते घर से खूब बढ़िया – बढ़िया पकवानों की खुशबू ने फिर घर में बुला लिया | होलिका – दहन का समय रात्रि १०.१५ पर था | चाचा जी के साथ गन्नों में जौ की बालियाँ बाँधी गईं | दीदी और सभी बच्चो के साथ उड़दी ,गुंझिया वगैरह लेकर चौक में बनी होली पर चढ़ाने के बाद सभी ने खाना खाया | सभी पकवानों में गुंझिया के साथ-साथ कांजी – बड़े बहुत स्वादिष्ट थे | कब समय बीता पता ही न चला | फिर सब सामान लेकर होली वाले स्थान पर पहुंचे | जोर से बजते ढोल और होली के गीतों ने समाँ  बाँध दिया था | प्रज्ज्वलित किए जाने बाद सभी ने जोर-जोर से जयकारे लगते हुए होली के चारों ओर प्रदक्षिणा की , जौ की बालियाँ भूनीं | नारियल , प्रसाद चढ़ाकर थोड़ा रंग-गुलाल सबको लगा,गले मिल , बड़ों के पैर छूकर घर लौट आए | चुनमुन का मन उमंगों से भरा था | कल खूब होली खेलेंगे |
परन्तु सुबह उठने पर उसका उत्साह फीका पड़ गया | बच्चों को बाहर होली खेलने जाने से सख्त मना कर दिया गया था | उदास मुख देख माँ ने सब बच्चों को अपने पास बुलाया और रात में तैयार किए गए टेसू , हल्दी ,मेंहदी ,अबीर-गुलाल के रंग देकर आँगन में खेलने के लिए कहा | फिर तो खूब हुड़दंग मचा | सूखे रंगों और हैण्ड-पम्प से पानी खींच-खींच कर सभी सराबोर हो गए | पड़ोस वाली ताई जी , दादी जी ,चाची जी और माँ सबने गोल-गोल घूम कर खूब होली के गीत गाए जो बहुत मजेदार लगे | गली में ढोल की आवाज़ सुनकर सभी छत पर चढ़ गए | मस्ती तो थी लेकिन देख कर डर भी लगा | ढोल बजाकर नाचती – गाती भीड़ में कुछ लोग कीचड़ में लथपथ थे ,लड़खड़ाकर इधर-उधर गिरे जा रहे थे और आपस में गाली-गलौच ,मारा-मारी कर रहे थे | यह कैसी होली थी ?
तब तक भूख लगने लगी थी | दादी माँ ने तैयार उबटन से रंग छुड़ाकर नहाने के लिए कहा तो थोड़ी ना-नुकुर के बाद सभी नहा लिए और मिलकर खाना खाया | खूब आनंद आया | थका होने पर भी किसी का सोने का मन न था |सभी छत पर बिस्तर बिछा कर एक साथ गप्पें मार रहे थे |माँ ने कहा , “चुनमुन होली का एक और मतलब है ...कि हो ली अर्थात जो भी बात होनी थी हो चुकी अब सभी पिछली कलह , वैर भाव को भुला कर परस्पर सद्भाव ,प्रेम और उमंग से जिएँ"|
चुनमुन सोच रहा था कि अब वापस लौटने का समय निकट है | उदास मन वह सो गया | सुबह उसे जगाकर माँ ने कहा जल्दी करो गाड़ी  पकड़नी है | मन मार कर तैयार होना पड़ा | घर और अड़ोस – पड़ोस  से सभी बच्चे-बड़े उन्हें छोड़ने के लिए आए | बच्चों ने चुनमुन से वादा लिया कि वह वर्ष में कम से कम एक बार होली पर अवश्य गाँव आएगा | मोहक ,प्यार भरे रंगों की यादों में डूबा चुनमुन सोच रहा था कि नशे ,कैमिकल भरे रंगों और आपसी वैर जैसी कुरीतियों को त्याग कर मनाया गया होली का त्यौहार कितना मनभावन है |


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 
चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, 30 September 2014

नवरात्र :शक्ति का आत्म साक्षात्कार !


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

                चिरंतन है भारतीय संस्कृति और चिंतन धारा ,जिसमें लोक एवं समाज के सर्वांगीण विकास के परिप्रेक्ष्य में समय-समय पर अनेक पर्वों-उत्सवों का विधान किया गया है ।वासंतिक एवं शारदीय नवरात्र भी ऐसे ही षाण्मासिक  यज्ञ हैं ।चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में वासंतिक तथा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि पर्यन्त शारदीय नवरात्र हैं, दशमी तिथि तो 'विजयदशमी' है ही ।चैत्र और आश्विन मास में ऋतु विकास होता है ,नई फसलें आती हैं एतदर्थ ईष्ट को नवान्न यज्ञादि द्वारा समर्पित कर उत्साहपूर्वक पूजन आराधन किया जाता है ।
श्री भगवद्गीता में कहा गया है -
"इष्टां भोगान ही वो देवा यास्यन्ते यज्ञ भाविता ,
तैर्दत्ता न प्रदायैभ्यो यो भुक्ते स्तेन एव स ।".....अर्थात यज्ञादि से सम्मानित देवता मनुष्यों की इच्छाओं को पूरा करेंगें किन्तु जो मनुष्य देवों द्वारा प्रदत्त पदार्थों को उनको अर्पित किए बिना उपभोग करे वह तस्कर है ।अतः प्रभु से प्राप्त पदार्थ पहले अपने ईष्ट -अभीष्ट देव को ही उत्साह पूर्वक समर्पित किए जाते हैं ।ऐसा ही पर्व नवरात्र पर्व भी है ।

            अस्तु, नवरात्र पर्व में विशेष रूप से भगवती देवी दुर्गा की ही आराधना का विधान है क्योंकि नवरात्र में ही देवी दुर्गा का अवतार हुआ था ।श्री दुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय में मेधा मुनि ने राजा सुरथ और वैश्य के प्रति इस आख्यान का निरूपण किया ।ऋषि ने कहा ...
"नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततं ।।६४ 
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम 
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ।।६५ 
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते 
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ।।६६ "

...अर्थात वास्तव में तो वह देवी नित्यास्वरूपा ही  हैं ।सम्पूर्ण संसार उन्ही का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है ,तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है ।वह मुझसे सुनो ।यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं फिर भी देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होने पर लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं ।महाप्रलय के उपरान्त चारों ओर जल ही जल व्याप्त था । शेषशैया पर योग निद्रा में लीन भगवान श्री विष्णु जी की नाभि से कमल और कमल से ब्रह्मा जी का प्रादुर्भाव हुआ ।तदन्तर प्रभु के कर्ण-मैल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुए ।दोनों के ब्रह्मा जी को मारने के लिए उद्यत होने पर ब्रह्मा जी ने भक्ति पूर्वक योगनिद्रा की स्तुति की ।योगनिद्रा भगवान श्री विष्णु जी के अंग प्रत्यंगों से निकल कर ब्रह्मा जी को दर्शन देने के लिए उपस्थित हो गईं और प्रभु भी योगनिद्रा से मुक्त हो शेष शैया पर आसीन हो गए ।तत्पश्चात ब्रह्मा जी को मारने के लिए उद्यत दोनों असुरों से प्रभु का अनन्त काल  तक बाहुयुद्ध हुआ ।भगवान की माया से मोहित असुरों ने भगवान से कहा कि हम तुम्हारे युद्ध कौशल से प्रसन्न हैं ,इच्छित वर माँगो ।भगवान ने कहा कि यदि ऐसा है तो मुझे वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथ से मारे जाओ ।प्रभु की माया से मोहित दैत्यों ने चारों ओर जल ही जल देख प्रभु से जहाँ जल न हो वहाँ उनका वध करने के लिए कहा ।प्रभु ने जंघा पर दोनों दैत्यों का सिर रखकर चक्र से उनका वध किया ।भगवान से उत्पन्न होकर यही महामाया दशभुजा महाकाली के रूप में प्रसिद्ध हुईं ।

एक अन्य प्रसंग में देवासुर संग्राम में देव पराजित हुए और दैत्यराज महिषासुर स्वर्ग में देवराज इंद्र के सिंहासन पर आरूढ़ हो गए ।अत्यंत दुखी देवगणों ने श्री ब्रह्मा जी को अग्रसर कर श्री महादेव जी और भगवान विष्णु जी से अपनी व्यथा कही ।रोष से युक्त श्री विष्णु जी के मुख से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ ।श्री दुर्गासप्तशती के दूसरे अध्याय में कहा है ..
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजं ।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ।।२/ १३ 

...इस प्रकार वह तेज श्री ब्रह्मा जी ,महादेव एवं अन्य देवताओं से उत्पन्न तेज से मिश्रित हो एक दिव्य-शक्ति संपन्न देवी के रूप में परिणत हो गया ।दैत्यराज महिषासुर से त्रस्त देवगण भगवती के दिव्य रूप तथा तेज को देख बहुत प्रसन्न हुए ।पुनः श्री विष्णु जी ,ब्रह्मा जी ,शिव जी तथा अन्य देवताओं ने अपने अपने अस्त्र-शस्त्रों से अन्य शस्त्रास्त्र प्रकट कर भगवती देवी को अर्पित किए ।इस प्रकार सर्वांग पूर्ण तेजोमयी और अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित देवी ने महिषासुर और उसकी आसुरी सेना का मर्दन किया तथा आज भी अपने वचनों के अनुसार न केवल देवों के अपितु प्राणिमात्र के कल्याण के लिए समय समय पर उपस्थित होती हैं ।

......और भी मार्कंडेय ऋषि द्वारा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला उपाय पूछे जाने पर परमपिता ब्रह्मा जी ने देवी कवच में देवी दुर्गा के नौ रूपों  शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी ,चंद्रघंटा ,कूष्मांडा ,स्कंदमाता ,कात्यायनी ,कालरात्री ,महागौरी तथा सिद्धिदात्री के आराधन का कथन किया ।नवरात्र के प्रथम दिवस 'शैलपुत्री' के रूप में पूजित देवी तन के साथ मानसिक दृढ़ता की प्रतीक हैं ।ब्रह्मचारिणी 'कर में कमल ,अक्षमाला ,कमण्डलु धारण किए तपस्विनी रूपा हैं तथा ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति कराने वाली हैं ।आह्लादकारी चन्द्रमा को धारण करने वाली चंद्रघंटा हैं ।कुत्सित ऊष्मा अर्थात् त्रिविध ताप युक्त विश्व को उदर में धारण करने वाली कूष्मांडा ,स्कन्द की माता होने से स्कंदमाता ,ऋषि कात्यायन की इच्छा पर उनके घर प्रकट होकर पुत्रीवत व्यवहार करने वाली कात्यायनी तथा सबको मारने वाले काल का भी विनाश करने वाली कालरात्री है ।तपस्या द्वारा महान गौरवर्ण प्राप्त करने से महागौरी और सर्व सिद्धि प्रदायिनी होने से सिद्धिदात्री हैं ।
         
वस्तुतः वर्त्तमान परिपेक्ष्य में यदि विचार करें तो अन्य पर्वों की भांति नवरात्र भी सामाजिक चेतना का पर्व है ।भगवती दुर्गा देवी की जन्म कथा के व्याज से स्मरण कराया जाता है कि भय मुक्त ,सुखी ,सुन्दर समाज के निर्माण के लिए प्राणी मात्र में स्थित पुरुष एवं प्रकृति तत्त्व को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाना आवश्यक है ,मन से मन मिले रहें ।उसमें भी स्त्री तत्त्व का सशक्तीकरण समस्त अनिष्टकारी तत्त्वों के विनाश में समर्थ होगा ।'पर्वतपुत्री 'की भांति शारीरिक ,मानसिक दृढ़ता अनाचार के विरुद्ध उसके अस्त्र हों ।अहंकार का विसर्जन कर परिवार में सबका हित साधती ब्रह्मचारिणीवत् तप ही जीवनचर्या हो ।चन्द्रमा को मस्तक पर लिए दशभुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धारिणी चंद्रघंटा की भांति सौन्दर्यमयी ,शीतल तो हो परन्तु कमजोर नहीं ।सिंहस्था और अंक में कार्तिकेय को धारण करने वाली स्कंदमाता की भांति वीर संतान प्रसविनी हो ।तेजस्विनी कूष्मांडा की तरह जीवन को ऊर्जा से परिपूर्ण करे ।महागौरी के रूप में परम सात्विकी शक्ति ,महा विदुषी जीवन को मधुरता पवित्रता से भर दे ।कात्यायनी का स्मरण पुत्री को महिमा मंडित कर उसके सुखद ,सुन्दर ,तेजस्वी रूप को स्थापित करता है ।'कालरात्रि के रूप में समाज में व्याप्त अज्ञानान्धकार को मिटाने में सर्वथा समर्थ है ।स्त्री ही समाज की ऐसी इकाई है जो आगत किसी भी अशुभ संकेत को सबसे पहले पकड़ती है और यदि पर्याप्त सहयोग मिले तो उसका समाधान करने की सामर्थ्य रखती है ।
सिद्धिदात्री की उपासना वास्तव में स्त्री के समाज के प्रति उस योगदान का स्मरण कराती है जहाँ वह एक कुशल गृहिणी के रूप में संतान ,पति एवं परिवार के साथ समाज के इतर कार्य कर्त्ताओं ,कर्मचारियों के प्रति भी सहृदयतापूर्वक अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करती हुई लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायिका होती है ।

"यत्रनार्यस्तु.....की उद्घोषणा करते भारत वर्ष में नारी की दशा आज किसी से छुपी नहीं है ।नित नए हृदय विदारक समाचार कहीं न कहीं सुनाई पड़ते हैं फिर भी आकाश में उड़ान भरती फ्लाइट लेफ्टिनेंट अंजली राठी ,फ़्लाइंग आफिसर प्रीति व अदिति या फिर दुर्गा शक्ति ,सुरेखा यादव ,इंदिरा ,अरुंधती भट्टाचार्य ,सानिया , ज्वाला गुट्टा , मैरीकॉम आदि को स्मरण करते हुए कहना आवश्यक है कि अँधेरों के साथ -साथ भोर की किरणों के संकेत हैं ,दिन तेजस्वी होगा ,बस ,नवरात्र के व्याज से शक्ति का आत्म साक्षात्कार हो ,शक्ति पर्व मने ,खूब धूम से मने ।इति ।

(उदंती पत्रिका एवं प्रभात केसरी पत्र में प्रकाशित )

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 

 चित्र गूगल से साभार 





Saturday, 22 June 2013

बहुत संवेदनाएँ ...!

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

                                                        "अतिवृष्टियाँ
                                                       खुद भेंट अपनी
                                                          अनावृष्टियाँ "
                                                                   और ......

                                                      "जग दरिया लाख कहे
                                                       जान गई मैं तो
                                                       परबत की पीर बहे "  

               जब ये पंक्तियाँ लिखीं थीं तब नहीं जानती थी कि आघात पर आघात सहते पहाड़ों की पीड़ा इस तरह द्रवीभूत होगी ....बादल का दिल इस तरह फट पड़ेगा ,,,और फिर सैलाब किसी के रोके न रुकेगा ....डुबो देगा पूरे भारत के दिल को आँसुओं के समंदर में.... लेकिन मन में कहीं न कहीं कोई चिंता ..आशंका थी ।
                             चिर काल से  तीर्थ यात्राएँ हमारी आध्यात्मिक ही नहीं मानसिक तथा शारीरिक सुदृढ़ता का कारण रही हैं ।ऊँचे पर्वतों ,समुद्र तटों ,गहन वनों और कंदराओं में स्थित सुरम्य तीर्थ स्थल ,तपोवन सुख-शान्ति दायक तथा प्रकृति की समीपता में आत्म साक्षात्कार का व्याज रहे |साथ ही आकर्षित करते रहे अपनी ओर ..जन मानस को ...सहज सुख की तलाश में |
                                         ऐसी ही व्याकुलता ने मुझे भी गत वर्ष माँ वैष्णों देवी ,श्री बद्रीनाथ जी एवं श्री केदार नाथ जी के दर्शनों का अवसर दिलाया |भव्य मनोहारी स्वरूप का दर्शन वास्तव में अभिभूत कर देने वाला अनुभव था जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना संभव ही नहीं है परन्तु चारों ओर फैले वातावरण  ने बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया |एक साथ इतनी अधिक संख्या में जनमानस की उपस्थिति  तो पर्यावरण को प्रभावित करती ही है साथ ही विभिन्न स्थानों पर फैलीं पानी की बोतलें ,केन तथा अन्य दूषित पदार्थ मन को खिन्न कर गए |मार्ग यात्रा को सुगम बना रहे थे लेकिन धुँआ उड़ाते वाहन और विस्फोटों से गूँजते पहाड़ जैसे कोई चेतावनी दे रहे थे |स्वाभाविक वन मात्र निषिद्ध क्षेत्र में ही दिखे |...और ..मैं सोचती रही ...कि यदि ऐसा ही रहा तो आने वाली पीढियों के लिए ...परिणाम  बहुत सुखकर नहीं होगा |
                                                                       सत् कार्यों के परिणाम धीरे-धीरे परन्तु भूलों का परिणाम तुरंत प्राप्त होता है |प्रकृति से छेड़छाड़ की भयंकर भूल का भयावह परिणाम आज सामने है |आँखे खोले या बंद करें वही दृश्य दिखाई देते हैं मन गहरे अवसाद और संवेदना से भर जाता है |आज समय है कि हम स्वयं पर्यावरण   के प्रति सचेत हों  ,निषिद्ध वस्तुओं यथा पोलीथीन .प्लास्टिक केन्स ,बोतलों आदि का प्रयोग नहीं करें , यथा संभव वृक्षारोपण करें ,वाहनों का समुचित आवश्यकतानुसार ही प्रयोग करें |सरकारी तंत्र को समय-समय पर उनके दायित्व का बोध कराएँ; क्योंकि उनमें भी हम या हमारे परिवार के ही लोग हैं | विकास हो लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं |
                          उठें ,आगे बढ़ें ,अपने अपने स्तर पर विपत्तिग्रस्त लोगों की सहायता करें ................और आज के सन्दर्भ में अंतिम और महत्वपूर्ण कि  धार्मिक यात्राओं तथा तीर्थ स्थलों का नैसर्गिक स्वरुप ..कम से कम कुछ निर्धारित सीमा तक ..बना रहे ,उन्हें  पिकनिक स्थल न बनने दें ..कभी नहीं ।यही हमारी उन दिवंगत आत्माओं  तथा उनके परिजनों के प्रति गहरी संवेदना होगी जो इस भयावह त्रासदी का ग्रास बने ॥
                                                               
बहुत संवेदनाओं के साथ ....
ज्योत्स्ना शर्मा