Showing posts with label होली. Show all posts
Showing posts with label होली. Show all posts

Saturday, 27 March 2021

157- खुशी के रंग !







 


दिल से दिल का जुड़े गुलाबी तार होली में
हो खुशियों के रंगों की बौछार होली में ।

सतरंगी सपने जो देखे तरसे नयनों ने
सच हो जाएँ सब के सब इस बार होली में !

*****************************

आया है रंगीला मौसम ,

कैसा छैल-छबीला मौसम ।


सब्ज धरा के अंग -अंग पर ,

लाल, गुलाबी , पीला मौसम ।


बागों में बौराया डोले , 

सुन्दर , खूब सजीला मौसम ।


आकर बैठ गया धरने पर ,

देखो आज हठीला मौसम ।


आँखों में अक्सर रहता है ,

सूखा कभी पनीला मौसम ।


लो देखो फिर से आया है ,

वादों का नखरीला मौसम ।


वो देखें तो मुझपर छाए ,

जाने क्यों शर्मीला मौसम ।


('उदंती' में प्रकाशित )


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

Tuesday, 22 March 2016

ये फागुन के रंग !



होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ !
             -डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

प्रगटे मनु तिथि पूर्णिमा ,उत्सव हुआ अपार 
जगती के प्रारम्भ का ,वासंती त्योहार ।।1

कहाँ क्रूर अति पूतना ,कहाँ सुकोमल श्याम 
अद्भुत लीला आपकी ,हर्षित गोकुल धाम ।।2

इत हाथों में लाठियाँ ,उत है लाल गुलाल 
बरसाने की गोपियाँ ,नन्द गाँव के ग्वाल ।।3

दहे होलिका वैर की ,खिले प्रेम प्रह्लाद 
सदय दृष्टि प्रभु की रहे ,बरसे बस आह्लाद ।।4

बड़ा दही-कर छोड़कर ,कांजी संग मुस्काय 
रसगुल्ले का ले गई ,गुँझिया हृदय चुराय ।।5

बस भल्लों की भूख है,ठंडाई की प्यास ।
घुमा फिरा कर मन बसे,गुझिया की ही आस ।।6

शक्करपारे चट हुए ,कम लगते पकवान ।
बना-बना कर हो गई ,माँ कितनी हैरान ।।7

दरवाज़े की ओट में ,टिकुआ खड़ा उदास ।
जाए ख़ाली हाथ क्या , अब बच्चों के पास ।।8

देख सयानी बेटियाँ ,किसका रंग गुलाल  
कैसे पीले हाथ हों ,सोचे दीन दयाल ।।9

नथनी , कंगन बेचकर , ले आया सामान ।
रमुआ के मन में बसी ,बिटिया की मुस्कान ।।10

सिंधारे में भेज दूँ , साड़ी संग गुलाल ।
बिटिया का सुख सोच कर ,मैया हुई निहाल ।।11

सीधे-साधे की हुई , आड़ी-तिरछी चाल । 
होली तेरे रंग ने , कैसा किया कमाल ।।12

भेदभाव सब मिट गए , खोई है पहचान ।
रंग लगाएँ शौक़ से , ज़रा लगाकर ध्यान ।।13 

एक वेश-परिवेश सब ,रंग-उमंगों डूब 
गले मिलन रसिया चले ,हुई धुलाई खूब ।।14

देखभाल कर कीजिए,रंगों का उपयोग ।
सुघढ़ ,सलोनी देह को,लगे न कोई रोग ।।15

धानी-पीली ओढ़नी ओढ़ धरा मुस्काय ।
रंग बिखेर कर ,सूरज भागा जाय ।।16

बौराया मौसम हुआ , पवन करे हुड़दंग ।
पागल मनवा माँगता,सदा तुम्हारा संग ।।17

बहे पवन सद्भाव की , चढ़े प्रेम की भंग  
खुशियों की वर्षा करें ,ये फागुन के रंग ।।18

तन-मन सारे रँग गए ,खूब चढ़ा ली भंग 
कैसे भूलूँ भारती ,मैं केसरिया रंग ।। 19

   ~~~~~~~~*****~~~~~~~~

(चित्र गूगल से साभार )

Wednesday, 4 March 2015

हाँ सखि होली !!



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

जब-जब पास हमारे आए
रंग ख़ुशी के मुख पर लाए
जी भर छेड़े ,करे ठिठोली 
क्या सखि साजन
ना सखि होली ।
२ 
करता मस्ती नहीं अघाए
भक्ति की कभी भाँग चढ़ाए 
फिरे बहकता करता गुनगुन
क्या सखि साजन
ना सखि फागुन ।
खूब मिले होली के मेले 
जब ग़ैरों के हाथों खेले
छेड़ ,भिगोए चोली सारी
क्या सखि साजन
ना पिचकारी । 
हृदय में धारे रस की धार
करें वो सब पर धम से वार
बचते फिरते उनसे सारे 
क्या सखि साजन
ना ग़ुब्बारे ।

~~~~&&&&&~~~~~~
चित्र गूगल से साभार