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Friday, 15 May 2020

144- भावों की धारा !



भावों की धारा है – तुमसे उजियारा है

डॉ ज्योत्स्ना शर्मा जी की साहित्यिकी माला में "तुमसे उजियारा है" माहिया छन्द-संग्रह रूपी तीसरा मोती सजने से उसकी चमक और बढ़ गई है एकल  हाइकु-संग्रह और एकल दोहा-संग्रह के बाद, उनका माहिया छन्द-संग्रह प्रकाशन में आया है । यह संग्रह इसलिए भी बहुत खास है क्योंकि यह किसी महिला रचनाकार का ‘प्रथम माहिया  छन्द संग्रह’ है ।जिस प्रकार की भावनात्मक खन उनके बालगीतों, छंदों,गीत, ग़ज़लों में  सुनाई देती है ,वैसी ही संवेदनाओं का स्पर्श मैंने इस माहिया-संग्रह को पढ़कर महसूस किया है ।  डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा जी का गद्य जितना प्रभावशाली है उनकी पद्य रचनाएँ भी उतनी ही आकर्षक और परिपक्व हैं डॉ. ज्योत्स्ना जी की पुस्तक में संकलित माहिया इंद्रधनुषी रंगों की तरह अपनी ओर आकर्षित करते हैंउनके काव्य में जीवन-दर्शन, प्रकृति-प्रेम, मरती संवेदनाओं का दर्द आदि भाव के दर्शन होते हैं । माहिया में कभी जीवन की गहन अनुभूतियों की झलक मिलती है तो कभी हास्य, प्रेम के रंग की रंगोली तो  कभी विरह की व्यंजना है देशप्रेम से परिपूर्ण माहिया पढ़कर मन द्रवीभूत हो जाता हैं भाव और शिल्प दोनों ही दृष्टिकोण से यह माहिया छंद-संग्रह एक अनुपमकृति हैमाँ वीणा वाली, नायक, कान्हा जी, की वन्दना कवयित्री ने बहुत भाव से की हैनके भक्ति भाव का परिचय निम्न माहिया पढ़कर महसूस किया जा सकता है -

भक्तों को मान दिया/ मोह पड़े अर्जुन/ गीता का ज्ञान दिया
मन उजला तन काला/ मोह गया मोहन/ मन, बाँसुरिया वाला
दिल खूब चुराता है/ लाल यशोदा का / फिर भी क्यों भाता है
जादूगर कैसे हो/ जो जिस भाव भजे / उसको तुम वैसे हो

उक्त माहिया छंदों में कवयित्री की, कान्हा जी के प्रति अटूट आस्था का परिचय मिलता है कवयित्री ने अपने  इष्ट की आराधना शब्दों के पुष्पों से  की है यह माहिया छन्द पढ़कर आँखों के आगे कान्हा जी की लीलाएँ नृत्य करने लगती हैं कभी चंचल रसिया कान्हा जी के दर्शन होते हैं तो कभी धीर-गम्भीर गीता का सार सुनाते मधुसूदन की छवि प्रकट होती है । भक्ति रस से इतर भाव के  माहिया देखिए -

मन फिरता मतवाला/ चख ली है तेरे/ दो नैनों की हाला
हर मौसम प्यारा है/ क्या डरना साथी जब साथ तुम्हारा है
खुशियों का रंग भरा/ तेरा साथ मिला/ मन गीतों का निखरा

शब्द साधना में रत कवयित्री प्रेमरस से जब, छंद का शृंगार करती हैं तब प्रणय की ऊष्मा मन के भावों को पिघलाने लगती है यह माहिया, प्रीतम के प्रति, कवयित्री का अटूट विश्वास और समर्पण भाव प्रकट करते हैं कवयित्री ने प्रणय दीप जलाकर अंतस के  प्रेम को प्रकट करने का जो प्रयास किया है उसमें वह सफल हुई है जब माहिया छंद में, प्रेम की स्वर लहरियाँ गूँजती हैं तब इनकी मधुरता और भी बढ़ जाती है

गागर मत छलकाना / हैं अनमोल प्रिये/ मोती मत ढुलकाना
क्या करना है जीकर / तेरे बिन सजना / यूँ आँसू पी –पीकर
बिगड़े सुरताल सभी/ पर उस पत्थर ने/ पूछा ना हाल कभी
गुलजार कतारें थी / ख्वाब तभी टूटा / जब पास बहारें थी
कवि हृदय अनेक अनुभूतियों की उद्गमस्थली है एक संवेदनशील हृदय अगर प्रेमिका की उमंगे महसूस करता है तो एक विरहिणी की पीड़ा का अहसास भी कर सकता हैउक्त माहिया छन्दों में कवयित्री ने विरह-वेदना के जो भाव प्रकट किये है उनमें करुण रस की प्रधानता का बोध होता है । अब हास्य का पुट देखिए-

कहने से डरते हो/ जान गई जानाँ/ तुम मुझपे मरते हो
यूँ तो तुम रानी हो/ पीतल की गगरी/ सोने का पानी हो
मौका है मेले का / ले चल साथ मुझे/ क्या काम अकेले का
ये तय इस बार किया/ मैं जाती मैके / घेरो घर-बार पिया
मत बात करो खोटी/ तुम घूमों जग में /  मैं घर सेकूँ रोटी
दुखती अँखियाँ मेरी/ फोन मुआ तेरा/ कितनी सखियाँ तेरी

निःसंदेह भारतीय संस्कृति के अनेक लोकगीत का आधार हास्यरस रहा है माहिया भी पंजाब का एक लोकगीत है हास्य, माहिया छंद का प्रधान रस है प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी की मधुर नोकझोंक में पंजाबी भाषा में अनेक माहिया रचे गए हैं और यही छेड़छाड़ लोकगीतों में लोकरंजन का आधार रही है उपर्युक्त माहिया प्रेम, मनुहार, मीठी अनबन से सराबोर हैं पत्नी द्वारा पति को जग भर में घूमने का मीठा ताना देना तथा फोन को मुआ कहकर छेड़ने का अंदाज होठों पर मधुर मुस्कान छोड़ जाता है  प्रीतम द्वारा प्रेमिका को पीतल की गगरी कह सम्बोधित करना बहुत सुंदर बन पड़ा है कवयित्री ने अपनी भारतीय लोकगीत परम्परा को सहेज कर इसे पुनः संरक्षित किया है

पाहन पर दूब उगी/ ‘मेल’ मिली हमको/ उनकी कल प्रेम पगी ।
जीवन को होम किया/ पर जिद ने मेरी/ पत्थर को मोम किया ।
कवयित्री नए युग में नई तकनीक “मेल” द्वारा प्रेमी से प्रेम-वार्ता करती प्रतीत होती हैं । आशावान कवयित्री आत्मविश्वास से भर कर पत्थर को मोम करने का सामर्थ्य रखती है । इन माहिया छन्दों में कवयित्री के स्वाभिमान, दृढ़ निश्चय का परिचय मिलता है । रिश्तों से परिवार और परिवार से समाज कैसे सँवरता है , देखिए-
आँचल की झोली में/ अक्षर ज्ञान मिला/ माँ तेरी बोली में ।
चंदा था रोटी में/ माँ कितने किस्से/ गूँथे है चोटी में
बदरी तो जा बरसे/ सुन ,भैया बहना/ राखी पे क्यों तरसे ।
दमके नैहर मेरा / खूब सजे भाभी/ शृंगार अमर तेरा ।

माँ की ममता का स्पर्श और बचपन के मधुर क्षण याद कर कवयित्री ने मनभावन माहिया रचे हैं। रिश्तों-नातों की मधुरता तथा त्योहारों की सुगन्ध मानव जीवन को आनन्दमय बना देती है । यह माहिया जीवन के गीतों जैसे प्रतीत होते हैं ।
थोड़ी मजबूरी थी/ सीमा की रक्षा/ भी बहुत जरूरी थी ।
कितनी बरसात हुई/ वीर शहीदों से / सपने में बात हुई ।
लिख गीत जवानों के/ जिनके दम पर हैं/ मौसम मुस्कानों के ।

 देश वीर शहीदों को समर्पित उपर्युक्त माहिया मन भूमि को नम कर देते हैं । जब कवयित्री शहीदों के परिवार की पीड़ा व्यक्त करती है उसे पढ़कर वीरों के बलिदान को बार-बार नमन करने को मन करता हैं। कर्त्तव्य के खातिर अपनी जान पर खेलकर देश की रक्षा करने वाले वीर जवानों का यशगान कर कवयित्री उनके त्याग समर्पण को माहिया छंद द्वारा अपनी श्रद्धा-सुमन समर्पित करती है।
झरने का नाद सुनो / मौन रहो मन से/ कोई संवाद बुनो ।
नस-नस में घोटला/ तन उनका उजला/ पर मन कितना काला ।
कैसे हालात हुए/ अब विख्यात यहाँ/ श्रीमन् कुख्यात हुए ।

लगभग सभी विषयों पर कवयित्री ने महिया रचे हैं । माहिया में कभी जीवन-दर्शन के रंग बिखर जाते हैं तो कभी विरोध के स्वर सुनाई देते हैं । ‘नस-नस में घोटला’ माहिया द्वारा देश की वर्तमान स्थिति का संजीव चित्रण किया गया है। आज मानव अपने पथ से भटक, यश को  अपयश  में बदल रहा है। यह देख कवयित्री कलियुग के पथभ्रष्ट मानव का वर्णन करती है

मुझे विश्वास है “तुमसे उजियारा है” माहिया छंद-संग्रह छंद परम्परा को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा । आधुनिक कवियों में माहिया जैसे लोकछन्दों की रचना के प्रति यह संग्रह आकर्षण उत्पन्न कर उन्हें संरक्षित करने में बड़ा योगदान देगा । यह आधुनिक रचनाकारों का कर्त्तव्य है कि हमारी अनमोल निधि ‘छंद’ अपने सही स्वरूप में अगली पीढ़ी तक पहुँचे, उसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु कवयित्री का यह प्रयास अवश्य रंग लाएगा । हिंदी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का रमणीय, मनहर आवरण-पृष्ठ बहुत कुछ कह जाता है । निश्चय ही यह संग्रह पाठक वर्ग में अपना विशिष्ट स्थान बनाएगा । इन्ही मंगलकामनाओं के साथ मैं कवयित्री डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा जी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ ।
सुनीता काम्बोज

कृति – तुमसे उजियारा है (माहिया छन्द-संग्रह)

कवयित्री – डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
प्रकाशक- हिंदी साहित्य निकेतन
16 साहित्य विहार
बिजनौर (उ.प्र.)
सम्पर्क – 01342-263232
पृष्ठ- 120; मूल्य- 225/-
समीक्षक – सुनीता  काम्बोज

Thursday, 22 February 2018

128 मन पंछी -सा


-सुनीता काम्बोज 


वरिष्ठ कवयित्री आदरणीया सुदर्शन रत्नाकर जी का हाइकु संग्रह " मन पंछी-सा "  पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ । पढ़ते - पढ़ते जैसे सृष्टि के हर रूप का दर्शन कर लिया हो । पुस्तक पढ़ना एक यात्रा की भाँति लगता है जैसे राही इस यात्रा के दौरान अनेक रसों का स्वादन करता है  यही इस पुस्तक यात्रा से अनुभव हुआ ।  तीन पँक्तियों का छोटा सा हाइकु तीन पँक्तियों में भावों का पूरा समन्दर समेटे हुए प्रतीत होता है । कवयित्री ने जिस संजीदगी से हाइकु रचे है वह अनुपम है ।
हाइकु संग्रह पढ़ते हुए अमलतास और मधुमालती की खुशबू श्वासों में बहने लगी । सार्थक लेखन वही होता है जो पाठक को मानसिक सुख प्रदान करे । बोलते हुए शब्द, अनूठी भाषा शैली हमेशा पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती है । सुदर्शन रत्नाकर जी ने लेखनी  को भावों की स्याही में डुबो कर हाइकु  में रंग भरे हैं।अपनी आस्था को कवयित्री ने हाइकु के रंग में ऐसे रँग दिया ।
साईं की कृपा  /  हों सब काम पूरे /  सुख के झूले |
प्रकृति सदियों से मानव की सखी रही है । जब मनुष्य प्रकृति की गोद में जाता है तो उसका दुलार मनुष्य की रूह को चैन देता है । सुदर्शन जी ने आकाश पर छाई लालिमानदियों, झरनों के प्रेम में बँधे किनारे , छिटकी चाँदनी, दूध केसर, जैसी उपमा से हाइकु को निखारा है इन सुंदर बिम्बों के  प्रयोग से प्रकृति के नये रूप के दर्शन होते हैं । ये अदभुत कल्पना शक्ति का ही जादू है । हाइकु पढ़ते ही हर भाव चित्र के रूप में आँखों के सामने तैरने लगता है । फुनगी पर चिड़िया फुदक कर झूला झूल रही हो, की छवि मन पटल पर उभर गई - 
उषा है आई / लाल दुपट्टा ओढ़े / फूल हैं खिले ।
फुनगी  पर / फुदकती चिड़िया / झूले वो झूला ।
पंछी के सुर / दूध केसर घुला / हुआ सवेरा ।
उगा है सूर्य / ज्यों धवल कमल / नीली झील में
गुलमोहर / गगन में उगता / बाल रवि ज्यों 
चुप खड़े हैं  / पलाश-अमलतास /  रोके ज्यों साँस।
अगले वर्ष  / प्रवासी ये बादल  / फिर लौटेंगे ।
कवयित्री ने बहुत संवेदनशीलता और गहनता से हाइकु का शृंगार किया है । ये उत्तम संग्रह कवयित्री की अदभुत काव्य साधना के दर्शन कराता हैं । हाइकु में प्रकृति सौन्दर्य देखते ही बनता है । मौसम के बदलते रूप को निहारते हुए कवयित्री ने जो हाइकु रचे हैं । उनकी सोंधी खुशबू इस संग्रह में महसूस की जा सकती है । मन पंछी -सा जाने कहाँ से क्या–क्या खोज लाता है ।देखिए-
पहली वर्षा / बिखरी सोंधी गंध / धरती पर ।
फूल न पत्ते / कैसा यह मौसम / रूखा जीवन ।
पत्ते सूखते / सूखकर गिरते / नए उगते ।
आया वसंत / झुके पेड़ बौर से / कूके कोयल ।

बड़े शहरों की पीड़ा और अकेलेपन का दर्द , मानव की वेदना , जीवन दर्शन पर लिखे हाइकु पाठक को ठहर कर सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं -
बड़े शहर / उतनी ही दूरियाँ / दिलों के बीच ।
दिल का दर्द /आँखों से बहता / राज कहता ।
मुँदी जो आँखे / खत्म जीवन-लीला / गया अकेला ।
आगे की सोचो / अतीत भूल जाओ / आज में जियो 
यही जीवन / पीड़ा सहनी होती / जो भी मिलती ।
अच्छा होता / मर्यादित जीवन / खुशियाँ देता ।
संकट आता / चरित्र निखरता / बल मिलता ।

संदेशात्मक और आज के परिवेश की तस्वीर खींचते हाइकु बहुत कुछ कह जाते है । संकट में मनुष्य बिखर जाता है पर उसे इन मुश्किलों से लड़कर जो बल मिलता है उससे ही उसे मंजिल का रास्ता मिलता है । कवयित्री मर्यादित जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है । जिससे आज भटका मानव संतोष और शान्ति को पा सके ।

हठीला मन / नहीं यह मानता / छला है जाता ।
तुम्हारे बिन / सालता है रहता / अकेलापन ।
साथ खेलना / पेड़ों पर झूलना / कैसे भूलूँ मैं ।
राहों में काँटे / बिछाए थे जो मैंने / मुझे भी चुभे ।
दिल के तार / बजता ज्यों सितार / तुम जो आए ।
तुम्हारा स्पर्श / ठंडी हवा का झौका / छूता मन को ।

प्रीत के रंग और बचपन की यादें विरह और मिलन का अहसास शिक्षा से परिपूर्ण हाइकु में कवयित्री ने कहा कि अगर किसी की राहों में हम काटें बिछातें है तो  वो हमें स्वयं को भी चुभते हैं ।

पिता का साया / बरगद की छाया / शीतल मन ।
प्रसव पीड़ा / भला कौन सहता / नहीं समता ।
माँ तू मन्दिर / रब तेरे अंदर / देखूँ तुझको ।
कष्ट में होती / उफ़ नहीं करती / धैर्य रखती
तुमसे ही तो / महके अंगना / मेरी बहना ।
अनमोल रिश्तों की शीतल छाया, पिता का साया, माँ की विशालता, रिश्तों में बहता स्नेह  हाइकु से झरता प्रतीत होता है ।
रिश्ते मानव को हमेशा ऊर्जा प्रदान करते हैं । यही जीवन का आधार हैं, नारी की पीड़ा और त्याग को हाइकु द्वारा कहना सरल नहीं  पर कवयित्री ने ये चमत्कार अपनी सशक्त लेखनी से कर दिखाया है । स्पष्टता और सहजता से इतने शानदार हाइकु रचना बहुत बड़ी बात है ।
मेरी प्रिय पुस्तकों में आ.सुदर्शन रत्नाकर जी का हाइकु संग्रह मन पंछी-सा भी शामिल हो चुका है । ये हाइकु संग्रह नवोदित रचनाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत्र है ।

वीर जवान / करते हैं सामना / बन चट्टान ।
महानगर / सागर लहराता / प्यासे मन ।
शोर ही शोर / कंकरीट जंगल / मेरा नगर। 
तुझे सलाम / देते तुम पहरा / करते रक्षा ।

वीर जवानों के अदम्य साहस व  देश भक्ति की भावना झरती काव्य गंगा प्यासे मन को तृप्त कर गई । महानगरों का सजीव चित्र और दिशा हीन मानव का रूप बहुत मार्मिक है ।अंत में मैं कवयित्री को हार्दिक बधाई देती हूँ आपकी लेखनी अविराम चलती रहे, इसी कामना के साथ आपके सुंदर भावों को नमन करती हूँ ।
सुनीता काम्बोज 

मन पंछी-सा (हाइकु -संग्रह): कवयित्री- सुदर्शन रत्नाकर ,मूल्य-200:00 रुपये
पृष्ठ-96 ,संस्करण :2016,प्रकाशक: अयन प्रकाशन , 1/20 महरौली नई दिल्ली-110030