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Thursday, 30 September 2021

164- भूले गले लगाना !


 

                  चंदा-सूरज

                मुट्ठी में बाँध लिए 

                सागर सारे

                पर्वत नाप लिए 

                अँधियारों पे

                विजय पा गए  हो

                उजालों में क्यूँ

                यूँ भरमा गए हो ?

                हवा, धूप भी

                दासियाँ हों तुम्हारी

                ममता नहीं

                स्वर्ण की आभ प्यारी

                ऊँचे भवन

                सारा सुख खजाना

                खुशियों भरे

                प्रीत के गीत गाना

                व्यर्थ ही तो हैं

                दे ही ना पाये जब

                माता-पिता को

                तुम दो वक्त खाना

                भूले गले लगाना ।


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)












Tuesday, 2 October 2012

5-कहे चंद्रिका /नई कोपलें


1-कहे चंद्रिका -डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

कहे चंद्रिका
चन्द्र ,सुनो हो तुम
साथ तुम्हारे
किन सोचों में गुम
पद्मिनी कहाँ
प्रियतम के पास
सुनो चंद्रिका
मेरा मन उदास
सुख क्षणिक
ये हो गया विश्वास
मानो चंद्रिका
यूँ हो गई उदास


कहे गीतिका
भाव ,सुनो हो तुम
साथ तुम्हारे
किन सोचों में गुम
विकल से भाव ने
मचल कहा
होकर नयनों से
सजल कहा
पग पग सजनी
छल का वास
सुनो तो कहूँ
मेरा मन उदास
भाव की कही
हृदय को छू गई
और गीतिका
यूँ उदास हो गई

कहे वर्तिका
दीप, सुनो हो तुम
साथ तुम्हारे
किन सोचों में गुम
मंदिरों में भी
नहीं प्रभु की आस
सुनो वर्तिका
मेरा मन उदास
सहज स्नेह
कर गया प्रवास
दीप- वर्तिका
यूँ हो गई उदास


प्राची की ओर
दीपित प्रभा उठी
आस- किरन 
बस मुस्कुरा उठी
समय- चक्र
चले ,यही संदेश
तम में रहे
प्रकाश का प्रवेश
गिनो तो पल
लो ,वसन्त भी आया 
मुदित मन
पतझर ने गाया
प्रमुदित- सा
चन्द्र गुनगुनाया
दीप मगन
रही संग वर्तिका
भाव रसिक
है प्रफुल्ल गीतिका
उदासी गई
तो उल्लास हो गया
उजियार- सा
हर मन के आज
आसपास हो गया ।
-0-
2- नई कोपलें
ज़रा तो देखो
नई कोपलें छिपीं
इसी शाख पे
धीमे से खिड़की से
जैसे हमको
देख रही हैं प्यारी
घबराए से
देखे भाव हमारे
ये करती हैं
हाँ ,क्या खूब इशारे
मानव मन
है कैसा भरमाया
नियति को भी
ये समझ न पाया 
लिया ,छोड़ न पाया ।.
-0-