1
बैठ ऐसे न हारकर पँछी
देख तू फिर उड़ान भर पँछी
तेज तूफान है , घटाएँ हैं
कड़कती बिजलियाँ डराएँ हैं
कोई मौसम सदा नहीं रहता
साथ तेरे मेरी दुआएँ हैं
जीत होगी ,न ऐसे डर पँछी
देख तू फिर उड़ान भर पँछी !
पथ में सूरज कभी सताता है
खुद भी जलता , तुझे जलाता है
इसको ढलना , ढलेगा ही,इसका
आना-जाना यही बताता है -
हौंसले रख संभालकर पँछी
देख तू फिर उड़ान भर पँछी !
बैठ ऐसे न हारकर पँछी
देख तू फिर उड़ान भर पँछी !
2
सुनो प्रार्थना हे प्रभु मेरी !
और करो मंगल ,मचा मन-संसद में दंगल !
ये इच्छाएँ लड़ें परस्पर
भाषण झाड़ रहीं
एक दूजे के लिखे हुए सब
पन्ने फाड़ रहीं
नहीं बस्तियाँ सभ्यजनों की
लगता है जंगल !
मचा मन-संसद में दंगल!
मुझको यूँ तड़पाकर इनको
दर्द नहीं होता
सूख गया है जैसे इनके
भावों का सोता
लिपटी चारों ओर सर्पिणी
त्याग हुआ संदल !
मचा मन-संसद में दंगल!
नम्र निवेदन मेरा ,इस पर
थोड़ा करो मनन
समझा दो कुछ या फिर इनका
कर दो आप दमन
अश्रु-जल से और अधिक अब
सिक्त न हो अंचल !
मचा मन-संसद में दंगल !
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा




