Thursday, 7 October 2021

166-सदा सदय हो



मन सबका सम्मान भी रखना ,
लेकिन स्वाभिमान भी रखना ।

करो अनुसरण गुणीजनों का ,
पर खुद की पहचान भी रखना ।

आगे बढ़ना पथ में , साथी ,
दीन-दुखी पर सदा सदय हो ;

प्रेम , अहिंसा , स्नेह , समर्पण ,
थोड़ा सा तूफान भी रखना ।।1

********************

होने को साकार ,सलोना-
स्वप्न कोई तो पलना होगा

मंज़िल पा लेने को ज़िद का
एक तूफान मचलना होगा

इसके साथ-साथ ही साथी
यही सत्य है इस जीवन में

नींद और आराम त्यागकर
खुद ही उठकर चलना होगा ।।2

********************

नदिया का मन सरसाने को
पर्वत को गलना होता है !

अम्बर छूने की चाहत में
सागर को जलना होता है  !

पाने और खोने की लय में
बँधा हुआ चलता है जीवन

एक सुनहरी साँझ की खातिर
सूरज को ढलना होता है ।।3

*********************

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 


(चित्र गूगल से साभार)




Monday, 4 October 2021

165- नभ के रंग


 


1
बढ़े तपिश
समाने लगे फिर
बिन्दु में सिंधु ।
2
आई जो आँधी
लो तिनका-तिनका
हुआ बसेरा ।
3
नन्ही चिड़िया
चाहती सहेजना
आँधी में नीड़।
4
गर्द उड़ाती
गिरा देती है आँधी
अकड़े पेड़।
5
स्याह दुशाला
आती है ओढ़कर 
देखो तो आँधी।
6
बूँदे झरतीं
किसी ने किसी पर
मिटा दी हस्ती ।
7
कैसी मोहनी
बादल चल दिए
आँधी के संग ।
8
नभ के रंग
टुकुर-टुकुर ही
देखती धरा।
9
अच्छा या बुरा
देखने नहीं देती
इश्क की आँधी ।
10
निहारे जो वो 
ज़रा प्यार से फिर 
खिले बहार ।

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

( चित्र गूगल से साभार)



Thursday, 30 September 2021

164- भूले गले लगाना !


 

                  चंदा-सूरज

                मुट्ठी में बाँध लिए 

                सागर सारे

                पर्वत नाप लिए 

                अँधियारों पे

                विजय पा गए  हो

                उजालों में क्यूँ

                यूँ भरमा गए हो ?

                हवा, धूप भी

                दासियाँ हों तुम्हारी

                ममता नहीं

                स्वर्ण की आभ प्यारी

                ऊँचे भवन

                सारा सुख खजाना

                खुशियों भरे

                प्रीत के गीत गाना

                व्यर्थ ही तो हैं

                दे ही ना पाये जब

                माता-पिता को

                तुम दो वक्त खाना

                भूले गले लगाना ।


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)












163- क्या पूछो हो !

 



क्या पूछो हो ' याद हमारी आती है ' ?
आएगी क्या , दिल से कब ये जाती है

रौशन है लेकिन धुँधला सा दिखता है
इक बदली जब सूरज पर छा जाती है

मर्यादा में बहे तो नदिया अच्छी है
तोड़े जो तटबंध ,प्रलय फिर ढाती है

ख्वाहिश का संसार अगर छोटा रख लो
सच मानों फिर दुनिया बहुत सुहाती है

चलते-चलते गिर जाओ तो उठ जाओ
अक्सर ठोकर रस्ता सही दिखाती है 

तनिक सफलता पर खुश होना ठीक नहीं
बनते-बनते बात बिगड़ भी जाती है

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

(चित्र गूगल से साभार)

Monday, 12 July 2021

162-प्रेम की नदी

 



1
पंक में जन्मे
बन नहीं पाते हैं
पंकज सभी ।
2
न्याय की देवी
सबूतों , गवाहों के
वश में रही ।
3
बादल छाए
टर्राते हैं दादुर 

नाचेें मयूर ।

4

चंचल नदी

सागर से मिलके
हो गई शान्त ।
5
चंचल नदी
शान्त हुई ,आखिर-
सिंधु से मिल ।
6
जाती है मिट
यायावरी बूँद की
सिंधु से मिल ।
7
करते यहाँ
उगते सूरज को
नमन सभी ।
8
बही थी कभी
भरी-भरी जल से
प्रेम की नदी ।
9
नदी तो बही
उसके ही किनारे
मिले न कभी ।
10
चला न पता
वृक्ष पर छा गई
अमरलता ।

11

प्रभु की माया
कहीं कड़ी सी धूप
कहीं है छाया।
12
बड़ी , गहरी
झील में था शिकारा
एक , बेचारा !
13
भ्रमजाल में
फँस, छटपटाती
मन की मीन ।
14
खेल के ऊबा
माँगता रहे बच्चा
नया खिलौना ।
15
अठखेलियाँ
करे मीन जल में
दूर, तड़पे।
16
दूर रहते
पशु पहचानते
विषाक्त पत्ते ।
17
नहीं खेवैया
बहती जाती नैया
धारा के संग ।


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)




Friday, 28 May 2021

161-ताऊ जी












आज पढ़िएगा ....चारों ओर फैली बेचैनियों के बीच एक हल्की- फुल्की रचना - 


दिन भर कितना लाड़ लड़ाते ताऊ जी 

नई कहानी रोज़ सुनाते ताऊ जी ।


भूलें चाहे पापा जी टॉफ़ी लाना 

दूध जलेबी खूब खिलाते ताऊ जी ।


चाचा कहते पढ़ ले, पढ़ ले , ओ मोटी ! 

उनको अच्छे से धमकाते ताऊ जी ।


कठिन पढ़ाई जब भी मुझको दुखी करे 

बड़े प्यार से सब समझाते ताऊ जी ।


छीन खिलौने जब भी भागे है भैया

कान खींचकर उसको लाते ताऊ जी ।


माँ-पापा संग शहर में आई हूँ लेकिन

याद बहुत ही मुझको आते ताऊ जी।

('जय विजय' के मई, 21 अंक में)

Jyotsna Sharma

Monday, 24 May 2021

160-आँखों में सपनों की महफिल

 




छोड़ो भी अब तो नादानी
मत छेड़ो वह तान पुरानी।

उड़े न चिड़िया अमन-चैन की
डालो इसको दाना पानी।

प्रेम- मुहब्बत के रंगों से 

दुनिया की तस्वीर सजानी ।

ठान अगर तुम लोगे मन में
मुश्किल भी होगी आसानी ।

चोट बहुत पहुँचाया करती
ये अपनों की नाफ़रमानी ।

मिल जाएँगे जब दिल से दिल
बात बनेगी तब लासानी ।

आँखों में सपनों की महफिल
दिल में यादें ,दिलबर जानी !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)