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Sunday, 31 October 2021

169-अनुभूतियों की सुन्दर यात्रा




आज पढ़िएगा छत्तीसगढ़ के सुविज्ञ साहित्यकार श्री रमेश कुमार सोनी जी द्वारा  मेरे हाइकु-संग्रह 'ओस नहाई भोर' की समीक्षा- 



अनुभूतियों की सुन्दर यात्रा-

                  हिंदी हाइकु अपनी साहित्यिक यात्रा में इतनी जल्दी अपनी लोकप्रियता के पंख पसार लेगा इसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी लेकिन इसकी सूक्ष्मता में भावों एवं अनुभूतियों की विशालता ने प्रायः सभी रचनाकारों को हाइकु के पक्ष में खड़ा किया. हिंदी हाइकु को विस्तार देने और इसकी पहचान बनाने में डॉ.सुधा गुप्ता जी के योगदान को रेखांकित करना होगा क्योंकि इन्हीं के संग्रहों को बाँचते हुए शेष रचनाकारों ने हाइकु की पंक्ति लम्बी की,वर्तमान में इस कार्य को रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशुजी प्रशंसनीय रूप से निभा रहे हैं. हाइकु ने विविध देशों में हिंदी की पताका फहराने का कार्य भी बखूबी किया जब इसके वेबसाईट-‘हिंदी हाइकु पर लोगों ने इसे रचने की प्रक्रिया को सीखा-जाना. हिंदी हाइकु में अब जापान से आयातित सिर्फ ढाँचा यानि-5,7,5 वर्ण में तीन पंक्ति का रह गया है, शेष का पूरी तरह से भारतीयकरण हो चुका है. कई विषयों पर अब तक, हाइकु के ढेरों एकल एवं सामूहिक संग्रह इन दिनों नवलेखकों के मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध हैं. हिंदी साहित्य अब सोशल मीडिया पर अपने हाइकु परोसते हुए खुश है लेकिन इन सबके बीच हम सभी वरिष्ठ हाइकुकारों को यहीं पर सावधान रहने की भी आवश्यकता है कि कहीं हाइकु के नाम पर साहित्यिक कचरा हमें परास्त ना कर दे.  

                    हिंदी हाइकु की सूक्ष्मता अब भी कई साहित्यकारों को पहेली जैसी लगती है लेकिन जिसने भी हाइकु का दामन थामा उसने अपनी अनुभूत संवेदनाओं को रचने में महारत हासिल कर ली इसी क्रम में एक नाम है-डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा का जिनका पहला हाइकु संग्रह-‘ओस नहाई भोर को बाँचने का मुझे सौभाग्य मिला है. इस संग्रह में कुल 490 हाइकु हैं जो इन उपशीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत हुए हैं-1.करूँ नमन!,  2. प्रकृति-सखि!, 3. कैसा कुचक्र?, 4. सुधियों की वीथिका , 5.बिखरा दूँ कलियाँ , 6.नवल किरण एवं 7. विविध रस-रंग। इस संग्रह के हाइकु आपकी जीवन यात्रा के सहचर बने हुए हैं जिन्हें आपने विविध समयों पर रचा, इन्हें पढ़ते हुए कहीं भी नहीं लगा कि यह आपका प्रथम संग्रह है. इस संग्रह में आपके भाषा कौशल की सुष्ठुता, कोमलता,तो कहीं प्रकृति के स्थान पर अपने आपको रखकर महसूस करने के भावों को हाइकु के मनके के रूप में पिरोने का श्रमसाध्य कार्य स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है, इनको रचते हुए आपने अपनी शिक्षा को भी सार्थक किया है.   

                      इस संग्रह का शुभारम्भ आपके हाइकु -पद्मासना की आराधिका और कान्हा की बावरी होती हुई-करते हैं जो आगे बढ़कर इस संसार के ईश्वर रूपी-माता एवं गुरु की महिमा को नमन करते हुए विस्तारित हुए हैं; इस खंड के हाइकु अध्यात्म से ओत-प्रोत हैं तथा माता और गुरु की महत्ता का बखान करते हुए उनकी शीतल छाँव में एक अलाव जलाने की कोशिश है-

करूँ नमन/माटी को भी सद्गुरू/करें चन्दन।

स्पर्श तुम्हारा/पीड़ा के सवालों का/हल है प्यारा।

                  हाइकु मूलतः प्रकृति के वेश में भली लगती है बिलकुल सजीली दुल्हन सी,प्रकृति का वर्णन इतना आसान भी नहीं कि बस कमरे में बैठा और लिख लिया; इसके लिए प्रकृति के साथ हमें जीना होता है और इस हेतु आपको भोर में उठना भी होगा तभी आप इतने सुन्दर दृश्य को अनुभूत करते हुए हाइकु में पिरो सकेंगे. इन हाइकु के शब्द जो संकेत में कह रहे हैं जो मानवीयकरण हम यहाँ महसूस कर रहे हैं ये अद्भुत है-

भोर किरन/उतरी है धरा के/छूने चरन।

धूप नागरी/पल-पल बदले/रूप बावरी।

दिशा-वधूटी/लो हो गई लाज से/भोर गुलाबी।

संदेशे लिखे/चाँदनी में डुबोके/निशा भोर के।

             भोर के साथ ही साथ हर दिन साँझ के आँचल में अपना शीश टिकाकर विश्राम पाती है लेकिन यह दृश्य भी भोर से कम नहीं होता हाँ, यहाँ भोर के जैसी ताजगी तो नहीं होती बल्कि होते हैं -अपनों का इंतजार, दिन के किस्से सुनने की बेताबी....और रात को न्यौता देते पूजा-अर्चना. संध्या सुंदरी का वर्णन करते हुए आपके हाइकु लजाते हुए प्रस्तुत हुए हैं-

संध्या सुंदरी/सुनहरी अलकें/खोले पवन।

जोगन सँझा/बैठी बैराग लिये/पंथ निहारे।

रात सलोनी/अलबेली मालिन/लाई कलियाँ।

रजनी बाला/कहाँ खोया है बाला/हँसिया वाला।

              बागों में अपनी और दूसरों की सुनते हुए टहलना हर किसी को सुहाता है लेकिन इन सबके बीच माली का परिश्रम और तितली-भौरों की चुहलबाजी पुष्पों के साथ एक नया और अद्भुत रंग जमाती है. बागों को वसंत रंगता तो है लेकिन इनसे होकर गुजरने वाली हवाओं की शोखियों के किस्सों का स्त्रियों की वर्तमान दशा के साथ यहाँ आपने तुलना की है,आपके हाइकु यहाँ संकेत में बहुत कुछ कहते हुए प्रकट हुए हैं-

पहने खड़ी/फूलों-भरी बगिया/काँटों के हार।

शोर न कर/सोई है नन्ही कली/नादान हवा।

मुस्काई कली/हो गई बदनाम/चर्चा है आम।

आवारा हवा/सिटी बजाते डोले/रोके न रुके।

            मेघों की आवारगी किसी से छिपी नहीं है कहीं कोई सूखे खेत राह ताकते हैं तो उसे ठेंगा दिखाकर ये लौट जाते हैं बिना बरसे, तो कभी अपनी रौद्र रूप दिखाकर जलप्लावन कर देते हैं,गाँव -शहर के साथ ये बहा कर ले जाते हैं लोगों के खेत,घर और सपने. मेघ को हवाएँ अपने कंधों पर इन्हें बिठाए सैर कराते रहती हैं लेकिन पहाड़ों पर भी विश्राम के पल में इनकी धमाचौकड़ी तबाही मचा कर ही छोड़ती है. इन सबके बावजूद लोग मेघ बुलाते हैं-पानी के लिए,मयूर नाचते हैं,लोग भीगते हैं और आपके जैसा कविमन इन्हीं बूँदों की अठखेलियों को हाइकु में समेट लेता है. इन सब हाइकु में मेघ और वर्षा के कई दृश्य एक साथ हैं इन्हें महसूस करिए-

कित्ता गुर्राए/बरसे न बूँद भी/ढोल बजाए।

मेघ महान/आएँ,बरसें,रोपें/खेतों में धान।

बूँद बरसीं/छनकीं हैं यादें भी/पैंजनियाँ सी।

नन्हीं बुंदियाँ/लेके हाथों में हाथ/नाचती फिरे।

निर्मोही चंदा/बदरी-संग खेले/आँख-मिचौली।

सोच न पाऊँ/बरखा री! कपड़े/कहाँ सुखाऊँ।

सूरज थका/डूब-डूब नहाए/गहरे नीर।

               वर्तमान समय की सबसे बड़ी त्रासदी प्रदूषण का दानव है जिसे आधुनिक जीवन शैली ने जन्मा है अब इससे बचने और इसकी व्यथा को आमजन तक पहुँचाने का बीड़ा यहाँ हाइकुकार ने उठाया है.आपने प्रदूषण की समस्या और समाधान का आईना समाज के समक्ष जोरों से उठाया है. पानी और आक्सीजन की कमी से जूझती एक बड़ी आबादी को हमने देखा है इसलिए पेड़ लगाने और पानी बचाने का सन्देश जनहित में है-

नाचेगा मोर?/बचा ही न जंगल/ये कैसी भोर?

काटें न वृक्ष/व्याकुल नदी-नद/धरा कम्पिता।

बादल धुआँ/घुटती-सी साँसें हैं/व्याकुल धरा।

कितना शोर/कोई तो समझाए/राम बचाए।

जल-जीवन/जाने हैं तो माने भी/सहेजें घन।

रहे अक्षत/धरती की चूनर/ओज़ोन पर्त।

                 प्रत्येक के जीवन में उनकी यादों का गुल्लक कभी नहीं भरता यह बहुत भूखा होता है-प्यार और स्नेह का, चाहे वह रिश्तों से मिले या समाज से. यादें हम सबकी अपनी धरोहर भी होती हैं जो बुढ़ापे में काम आती हैं-बच्चों के किस्सागोई के लिए. इस खंड के हाइकु सशक्त हैं और जीवन के हर पड़ाव की खुशियों एवं  व्यथा को समेट कर ले आए हैं. इनमें हमें मिलेगा-ब्याह की ख़ुशी और गम,मायके की यादें, माँ बनने के दर्द में ख़ुशी, सखियों एवं भाई की यादें...आदि. आप भी इस खंड के हाइकु में अपनी खुशियों और यादों को खोजने का प्रयत्न करिए-

कनी रेत की/सहे सीप में पीड़ा/बनेगी मोती।

यादों की बस्ती/हर घर पे लिखा/तेरा ही नाम।

सुन रे मन!/आँसू और मुस्कान/यही जीवन।

बर्फ़ थे रिश्ते/यादों के अलाव/दे गए ताप।

                   भारतवर्ष अपने उत्सवों के लिए जाना जाता है, जितनी ऋतुएँ उससे भी ज्यादा उमंग-ख़ुशी और विविध स्मृतियों से जुड़े उत्सव सबके रंग निराले और हम सबने इसके साथ-साथ अपना-अपना समय बिताया है इसलिए ये अब ये यहाँ साहित्यिक उत्सव लेकर प्रस्तुत  हुए हैं. इन हाइकु में हमें दर्शन करने को मिलेगा-होली,दिवाली,राखी,गौरा पूजा,...औरअन्य त्यौहारों की उमंग,इसके शुभ सन्देश और उजास भावनाओं का प्रवाह –

चुन लूँ काँटे/तेरे पथ से साथी/खिलें बहारें।

रेशमी स्पर्श/मन्त्र अभिसिंचित/पुष्प वज्र-सा।

चाह युगों की/जले दीप से दीप/ज्योति पर्व हो।

               बाल्यकाल सदैव से ही ईश्वर की लीलाओं की तरह ही अब भी यहाँ निभाया जाता है जो हम सबकी खुशियों को बढ़ाने ही आता है वैसे भी दुनियावी चिंता से मुक्त ये अवस्था हम सबके लिए निश्च्छलता और भोलेपन को परिभाषित करता है. हमें इन हाइकु में दर्शन होंगे-कोमलता,सरल-सहज भाषा,बच्चों के खेलकूद , चंदा मामा, मिट्ठू ,धौली गाय और ...मोर नृत्य. ये हाइकु इस संग्रह के सबसे अच्छे हाइकु हैं-

दे दाना भैया/चुनमुन चिरैया/करे ता-थैया!

कितनी प्यारी/घूम-घूम झालर/फ्रॉक हमारी।

मछली रानी/डूब, डूब देख आ/कित्ता है पानी?

           विविध दृश्यों से गुजारते हुए ये हाइकु हमें अपने अंतिम पड़ाव में लेकर आते हैं जहाँ हमें अपने वर्तमान के दर्शन होते हैं जो हमारे ही भूतकाल के किए हुए कृत्यों का परिणाम हैं. इस खंड में हैं-गाँव की यादें,शहर से तुलना,लोभी मानव...और चुनाव. इन हाइकु की शब्दशक्ति को परखिए कि ये कितनी सहजता से अपनी सामाजिक विषमता को हमारे समक्ष आईना की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं-

रोया है नीम/बाँट दिए आँगन/माँ तकसीम।

बँटा समाज/चलती हैं गोलियाँ/मेड़ों पे आज।

विकास दूर/हुआ ग्राम्य जीवन/नशे में चूर।

बगिया मौन/नफ़रत के बीज/बो गया कौन?

                   प्रथम संकलन के अनुसार आपकी लेखनी ने आपके हाइकु को भटकने से रोका हैं, आपकी शब्दशक्ति और भावों को संकेतों के रूप में प्रस्तुत करने की कला आपके इस संग्रह को विशिष्ट बनाती है साथ ही ये उम्मीद भी जगाती है कि आपमें एक बेहतरीन हाइकुकार की सभी संभावनाएँ छिपी हुई हैं.

इस संग्रहणीय एवं पठनीय अंक की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ-

बीता है कल/आज को भी जाना है/फिर आना है।

दूँ शुभेच्छाएँ/फलित कामनाएँ/सब हो जाएँ।   



                                          

 

                                      

2021

रमेश कुमार सोनी

कबीर नगर-रायपुर (छत्तीसगढ़ )

7049355476  / 9424220209

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ओस नहाई भोर-हाइकु संग्रह , डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

अयन प्रकाशन-दिल्ली, सन-2015 , मूल्य-240/-रु. , ISBN; 978-81-7408-808-6

भूमिका-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु , फ्लैप-डॉ.सुधा गुप्ता-मेरठ

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Thursday, 22 February 2018

128 मन पंछी -सा


-सुनीता काम्बोज 


वरिष्ठ कवयित्री आदरणीया सुदर्शन रत्नाकर जी का हाइकु संग्रह " मन पंछी-सा "  पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ । पढ़ते - पढ़ते जैसे सृष्टि के हर रूप का दर्शन कर लिया हो । पुस्तक पढ़ना एक यात्रा की भाँति लगता है जैसे राही इस यात्रा के दौरान अनेक रसों का स्वादन करता है  यही इस पुस्तक यात्रा से अनुभव हुआ ।  तीन पँक्तियों का छोटा सा हाइकु तीन पँक्तियों में भावों का पूरा समन्दर समेटे हुए प्रतीत होता है । कवयित्री ने जिस संजीदगी से हाइकु रचे है वह अनुपम है ।
हाइकु संग्रह पढ़ते हुए अमलतास और मधुमालती की खुशबू श्वासों में बहने लगी । सार्थक लेखन वही होता है जो पाठक को मानसिक सुख प्रदान करे । बोलते हुए शब्द, अनूठी भाषा शैली हमेशा पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती है । सुदर्शन रत्नाकर जी ने लेखनी  को भावों की स्याही में डुबो कर हाइकु  में रंग भरे हैं।अपनी आस्था को कवयित्री ने हाइकु के रंग में ऐसे रँग दिया ।
साईं की कृपा  /  हों सब काम पूरे /  सुख के झूले |
प्रकृति सदियों से मानव की सखी रही है । जब मनुष्य प्रकृति की गोद में जाता है तो उसका दुलार मनुष्य की रूह को चैन देता है । सुदर्शन जी ने आकाश पर छाई लालिमानदियों, झरनों के प्रेम में बँधे किनारे , छिटकी चाँदनी, दूध केसर, जैसी उपमा से हाइकु को निखारा है इन सुंदर बिम्बों के  प्रयोग से प्रकृति के नये रूप के दर्शन होते हैं । ये अदभुत कल्पना शक्ति का ही जादू है । हाइकु पढ़ते ही हर भाव चित्र के रूप में आँखों के सामने तैरने लगता है । फुनगी पर चिड़िया फुदक कर झूला झूल रही हो, की छवि मन पटल पर उभर गई - 
उषा है आई / लाल दुपट्टा ओढ़े / फूल हैं खिले ।
फुनगी  पर / फुदकती चिड़िया / झूले वो झूला ।
पंछी के सुर / दूध केसर घुला / हुआ सवेरा ।
उगा है सूर्य / ज्यों धवल कमल / नीली झील में
गुलमोहर / गगन में उगता / बाल रवि ज्यों 
चुप खड़े हैं  / पलाश-अमलतास /  रोके ज्यों साँस।
अगले वर्ष  / प्रवासी ये बादल  / फिर लौटेंगे ।
कवयित्री ने बहुत संवेदनशीलता और गहनता से हाइकु का शृंगार किया है । ये उत्तम संग्रह कवयित्री की अदभुत काव्य साधना के दर्शन कराता हैं । हाइकु में प्रकृति सौन्दर्य देखते ही बनता है । मौसम के बदलते रूप को निहारते हुए कवयित्री ने जो हाइकु रचे हैं । उनकी सोंधी खुशबू इस संग्रह में महसूस की जा सकती है । मन पंछी -सा जाने कहाँ से क्या–क्या खोज लाता है ।देखिए-
पहली वर्षा / बिखरी सोंधी गंध / धरती पर ।
फूल न पत्ते / कैसा यह मौसम / रूखा जीवन ।
पत्ते सूखते / सूखकर गिरते / नए उगते ।
आया वसंत / झुके पेड़ बौर से / कूके कोयल ।

बड़े शहरों की पीड़ा और अकेलेपन का दर्द , मानव की वेदना , जीवन दर्शन पर लिखे हाइकु पाठक को ठहर कर सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं -
बड़े शहर / उतनी ही दूरियाँ / दिलों के बीच ।
दिल का दर्द /आँखों से बहता / राज कहता ।
मुँदी जो आँखे / खत्म जीवन-लीला / गया अकेला ।
आगे की सोचो / अतीत भूल जाओ / आज में जियो 
यही जीवन / पीड़ा सहनी होती / जो भी मिलती ।
अच्छा होता / मर्यादित जीवन / खुशियाँ देता ।
संकट आता / चरित्र निखरता / बल मिलता ।

संदेशात्मक और आज के परिवेश की तस्वीर खींचते हाइकु बहुत कुछ कह जाते है । संकट में मनुष्य बिखर जाता है पर उसे इन मुश्किलों से लड़कर जो बल मिलता है उससे ही उसे मंजिल का रास्ता मिलता है । कवयित्री मर्यादित जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है । जिससे आज भटका मानव संतोष और शान्ति को पा सके ।

हठीला मन / नहीं यह मानता / छला है जाता ।
तुम्हारे बिन / सालता है रहता / अकेलापन ।
साथ खेलना / पेड़ों पर झूलना / कैसे भूलूँ मैं ।
राहों में काँटे / बिछाए थे जो मैंने / मुझे भी चुभे ।
दिल के तार / बजता ज्यों सितार / तुम जो आए ।
तुम्हारा स्पर्श / ठंडी हवा का झौका / छूता मन को ।

प्रीत के रंग और बचपन की यादें विरह और मिलन का अहसास शिक्षा से परिपूर्ण हाइकु में कवयित्री ने कहा कि अगर किसी की राहों में हम काटें बिछातें है तो  वो हमें स्वयं को भी चुभते हैं ।

पिता का साया / बरगद की छाया / शीतल मन ।
प्रसव पीड़ा / भला कौन सहता / नहीं समता ।
माँ तू मन्दिर / रब तेरे अंदर / देखूँ तुझको ।
कष्ट में होती / उफ़ नहीं करती / धैर्य रखती
तुमसे ही तो / महके अंगना / मेरी बहना ।
अनमोल रिश्तों की शीतल छाया, पिता का साया, माँ की विशालता, रिश्तों में बहता स्नेह  हाइकु से झरता प्रतीत होता है ।
रिश्ते मानव को हमेशा ऊर्जा प्रदान करते हैं । यही जीवन का आधार हैं, नारी की पीड़ा और त्याग को हाइकु द्वारा कहना सरल नहीं  पर कवयित्री ने ये चमत्कार अपनी सशक्त लेखनी से कर दिखाया है । स्पष्टता और सहजता से इतने शानदार हाइकु रचना बहुत बड़ी बात है ।
मेरी प्रिय पुस्तकों में आ.सुदर्शन रत्नाकर जी का हाइकु संग्रह मन पंछी-सा भी शामिल हो चुका है । ये हाइकु संग्रह नवोदित रचनाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत्र है ।

वीर जवान / करते हैं सामना / बन चट्टान ।
महानगर / सागर लहराता / प्यासे मन ।
शोर ही शोर / कंकरीट जंगल / मेरा नगर। 
तुझे सलाम / देते तुम पहरा / करते रक्षा ।

वीर जवानों के अदम्य साहस व  देश भक्ति की भावना झरती काव्य गंगा प्यासे मन को तृप्त कर गई । महानगरों का सजीव चित्र और दिशा हीन मानव का रूप बहुत मार्मिक है ।अंत में मैं कवयित्री को हार्दिक बधाई देती हूँ आपकी लेखनी अविराम चलती रहे, इसी कामना के साथ आपके सुंदर भावों को नमन करती हूँ ।
सुनीता काम्बोज 

मन पंछी-सा (हाइकु -संग्रह): कवयित्री- सुदर्शन रत्नाकर ,मूल्य-200:00 रुपये
पृष्ठ-96 ,संस्करण :2016,प्रकाशक: अयन प्रकाशन , 1/20 महरौली नई दिल्ली-110030


Wednesday, 23 September 2015

दो कविताएँ !



अनिता मंडा


रूह
१ 
आग इसे जला नहीं सकती
पानी गला नहीं सकता
हवा इसे सुखा नहीं सकती
पर सदा छुअन से परे
कब रह पाती है रूह
दबती तो है यादों के बोझ से
काँपती तो है काली
अँधेरी परछाइयों से
तोड़ते तो हैं दुःख के
पत्थर इसे
बंधती तो है
मोह के धागों से
कहाँ रह पाती है
रूह आज़ाद।

 २ 

सज़दे में है या गुनाह में है
दिल तू ही बता किस राह में है...

फिर एक छनाका होने को है
शीशा पत्थर की पनाह में है...

अब रूह काँपती है इस चमन की
कली इक खिलने की चाह में है...

यूँ खेला न करो टूटे दिल से
कुछ तो असर उसकी आह में है...

हमसे सच कह दिया करो हुजूर
कुछ ना रखा झूठी सी वाह में है...

छुपा ना रहेगा कुछ भी उससे
अब हर कदम उसकी निगाह में है...

~~~~~~~****~~~~~~~

(चित्र गूगल से साभार)

Thursday, 11 June 2015

सृष्टि-सृजन




निवेदन !
 राजस्थान में जन्मी ,पली-बढीं ,हिन्दी एवं इतिहास में स्नातकोत्तर स्तरतक शिक्षा प्राप्त सुश्री अनिता मंडा अपने सुरुचि पूर्ण लेखन से साहित्य-साधना में संलग्न हैं।आज उनकी एक ऐसी ही रचना प्रस्तुत है।आशा करती हूँ आपका स्नेह-आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करेगी |
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा




सृष्टि-सृजन

    -अनिता मंडा 

एक ख़ामोशी की
नदी जमकर
बन गई हिम शिखर
तुम्हारे भीतर
एक आँच
सुलगा रही है
मुझे भी सदियों से
इस आँच को छुपाए
बनते हुए राख
क्षण-प्रतिक्षण
तड़प- झुलस
नहीं बुझने दी आँच।
इसी प्रतीक्षा में
कि एक दिन
ये आँच
पिघला देगी हिमशिखर
मुक्त्त हो जाओगे तुम
हृदय -भार से।
पर यह आभास रहे
हिमशिखर आँच के
इतना ही पास रहे
बहे नदी बनकर
सैलाब बनकर नहीं।
सृष्टि-सृजन हो बाधित
यह मुझे स्वीकार नहीं।
खिले सृष्टि
खिले वसन्त
नदी- नीर लेकर
खिले धरा।
एक टहनी जिस पर
खिले हैं स्मृति -पुष्प
आओ हिलाएँ मिलकर
चुन लें फूल
आधे तुम्हारे
आधे मेरे।
धरती पर पाँव जमाएँ
छुएँ आसमाँ के तारे
पा लें पूर्णता
उस समग्र का अंश
अनुभूत हमें
करें निर्मित संतुलन
प्रकृति के साथ।




-0-

 (चित्र गूगल से साभार )