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Wednesday, 1 November 2023

185- अर्घ्य प्रेम का

 



दिल ये चाहे
बिखरा दूँ कलियाँ
राहों में तेरी ।

न आँसू तुम
कजरा भी नहीं हो
नैनों मे बसे ।

चिरसंगिनी
खुशियाँ हों तुम्हारी
दुआ हमारी ।

लाज-चूनर
उमंगों के कंगन
प्रेम का अर्घ्य ।

सौभाग्य माँगूँ
खुशियों की पायल
बजती रहे ।

हों पूरे सदा-
नयनों में सजे जो,
ख्वाब तुम्हारे ।

तेरे प्यार ने
नहीं बुझने दिया
जीवन-दिया ।

मेरी दुआएँ
सजनी सदा संग
पिया का पाएँ ..... करक चतुर्थी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ 💐💐

ज्योत्स्ना 




Sunday, 24 April 2022

172- अद्भुत कृति

 

                                 (चित्र गूगल से साभार)

प्रबुद्ध नारी 

समझे है जग को

न कहो 'ना री' !1

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खुलीआँखों से

देखतीं हैं सपने 

सच भी करें ।2

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रचा संसार

जन्मे हैं तुमने ही

राम, कृष्ण भी ।3

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जगदंबे तू

करुणा बरसाती

चण्डी भी तू ही।4

***********

नव कलिका

जीवन की सुगंध 

रंग है नारी ।5

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सुघड़ नारी 

खुशियों की कुन्जी है

अमोल रत्न ।6

***********

समेटे चली

छिन्न-भिन्न सपने 

आशा के मोती।7

***********

पंख कटे थे 

छूती आज अम्बर

भरे उड़ान।8

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जीवन दात्री 

पोरती है संस्कार 

दूध के संग ।9

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जीवन धात्री

प्रथम शिक्षिका है

सँवारे मन ।10

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सच्ची संगिनी

खुशियों के रंग से 

भरे जीवन ।11

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कहते माया 

दुनिया में उसका 

जादू है छाया ।12

***********

न मानी हार 

घुट-घुटके जीना 

नहीं स्वीकार ।13

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अद्भुत कृति 

पूजित, विमर्दित 

दूर्वा जैसी तू ।14

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तेरी कथायें 

अनगिन व्यथाएँ 

सदानीरा तू ।15

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भगिनी, सुता 

विविध रूप धरे 

धन्य ही करे ।16

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कोहरा घना

खोलती है खिड़की

एक किरण ।17

***********

गहन तम 

चन्द्रिका ही आकर 

बाँटे उजाला।18

***********

जीवन यात्रा 

बनती संजीवनी 

चिर संगिनी ।19

***********

स्वयं ईश्वरी 

साकार ममता है 

माँ रूप तेरा !20


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

Monday, 4 October 2021

165- नभ के रंग


 


1
बढ़े तपिश
समाने लगे फिर
बिन्दु में सिंधु ।
2
आई जो आँधी
लो तिनका-तिनका
हुआ बसेरा ।
3
नन्ही चिड़िया
चाहती सहेजना
आँधी में नीड़।
4
गर्द उड़ाती
गिरा देती है आँधी
अकड़े पेड़।
5
स्याह दुशाला
आती है ओढ़कर 
देखो तो आँधी।
6
बूँदे झरतीं
किसी ने किसी पर
मिटा दी हस्ती ।
7
कैसी मोहनी
बादल चल दिए
आँधी के संग ।
8
नभ के रंग
टुकुर-टुकुर ही
देखती धरा।
9
अच्छा या बुरा
देखने नहीं देती
इश्क की आँधी ।
10
निहारे जो वो 
ज़रा प्यार से फिर 
खिले बहार ।

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

( चित्र गूगल से साभार)



Monday, 12 July 2021

162-प्रेम की नदी

 



1
पंक में जन्मे
बन नहीं पाते हैं
पंकज सभी ।
2
न्याय की देवी
सबूतों , गवाहों के
वश में रही ।
3
बादल छाए
टर्राते हैं दादुर 

नाचेें मयूर ।

4

चंचल नदी

सागर से मिलके
हो गई शान्त ।
5
चंचल नदी
शान्त हुई ,आखिर-
सिंधु से मिल ।
6
जाती है मिट
यायावरी बूँद की
सिंधु से मिल ।
7
करते यहाँ
उगते सूरज को
नमन सभी ।
8
बही थी कभी
भरी-भरी जल से
प्रेम की नदी ।
9
नदी तो बही
उसके ही किनारे
मिले न कभी ।
10
चला न पता
वृक्ष पर छा गई
अमरलता ।

11

प्रभु की माया
कहीं कड़ी सी धूप
कहीं है छाया।
12
बड़ी , गहरी
झील में था शिकारा
एक , बेचारा !
13
भ्रमजाल में
फँस, छटपटाती
मन की मीन ।
14
खेल के ऊबा
माँगता रहे बच्चा
नया खिलौना ।
15
अठखेलियाँ
करे मीन जल में
दूर, तड़पे।
16
दूर रहते
पशु पहचानते
विषाक्त पत्ते ।
17
नहीं खेवैया
बहती जाती नैया
धारा के संग ।


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)




Friday, 9 April 2021

159- सारा आकाश !

 












मन में शोर
भागी है उठकर
नैनों से नींद ।1

****

पक्की दीवार
कीलों की फितरत
जाती है हार !2

****

ऊषा मगन
ले मोतियों के हार
करे शृंगार !3

****

थामो कमान
तरकश से तीर
स्वयं न चलें ।4

****

काव्य-कुसुम
प्रेम की सुगंध में
भीगे-से शब्द !5

****

रहे अछूता
विकट विकारों से
भाव-भवन ।6

****

उड़ी पतंग
नाच रही नभ में
डोर बँधी है ।7

****

फिक्र में जागे
नयनों में सपने
नहीं सजते ।8

****

दिया उसने
बाहों में भरकर
सारा आकाश ।9

****

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

Wednesday, 6 February 2019

141- मन का इकतारा !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा


जाने के बाद
करती रहीं यादें
मुझको याद।1

सबको भाते
सोते हुए,ख्वाब में-
मुस्काते बच्चे ।2

मत उठाना
अँगुली किसी ओर
टूटना तय ।3

कमी तो न थी
फिर भी सहेजे हैं
तेरे भी गम ।4

चलते रहे
मूँदकर आखों को
वही सही था ।5

वो कहाँ रुका
लगता था ऐसा,कि-
गगन झुका ।6


उड़ता पंछी
ताक लगाए बाज
बैठा शिकारी।7

सूरज आया
आँगन किलकता
हँसते फूल।8

अनोखे किस्से
छुपाए हुए बैठी
अँधेरी रात ।9

कैसा गुरूर
शीशे का यह घर
होना है चूर ।10
  
गाता ही रहे
मन का इकतारा
गीत तुम्हारा।11

धुंधली हुईं
कुहासे में किरणें
वक्त की चाल ।12


-०-०-०-०-०-०-

(चित्र गूगल से साभार) 

Thursday, 22 February 2018

128 मन पंछी -सा


-सुनीता काम्बोज 


वरिष्ठ कवयित्री आदरणीया सुदर्शन रत्नाकर जी का हाइकु संग्रह " मन पंछी-सा "  पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ । पढ़ते - पढ़ते जैसे सृष्टि के हर रूप का दर्शन कर लिया हो । पुस्तक पढ़ना एक यात्रा की भाँति लगता है जैसे राही इस यात्रा के दौरान अनेक रसों का स्वादन करता है  यही इस पुस्तक यात्रा से अनुभव हुआ ।  तीन पँक्तियों का छोटा सा हाइकु तीन पँक्तियों में भावों का पूरा समन्दर समेटे हुए प्रतीत होता है । कवयित्री ने जिस संजीदगी से हाइकु रचे है वह अनुपम है ।
हाइकु संग्रह पढ़ते हुए अमलतास और मधुमालती की खुशबू श्वासों में बहने लगी । सार्थक लेखन वही होता है जो पाठक को मानसिक सुख प्रदान करे । बोलते हुए शब्द, अनूठी भाषा शैली हमेशा पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती है । सुदर्शन रत्नाकर जी ने लेखनी  को भावों की स्याही में डुबो कर हाइकु  में रंग भरे हैं।अपनी आस्था को कवयित्री ने हाइकु के रंग में ऐसे रँग दिया ।
साईं की कृपा  /  हों सब काम पूरे /  सुख के झूले |
प्रकृति सदियों से मानव की सखी रही है । जब मनुष्य प्रकृति की गोद में जाता है तो उसका दुलार मनुष्य की रूह को चैन देता है । सुदर्शन जी ने आकाश पर छाई लालिमानदियों, झरनों के प्रेम में बँधे किनारे , छिटकी चाँदनी, दूध केसर, जैसी उपमा से हाइकु को निखारा है इन सुंदर बिम्बों के  प्रयोग से प्रकृति के नये रूप के दर्शन होते हैं । ये अदभुत कल्पना शक्ति का ही जादू है । हाइकु पढ़ते ही हर भाव चित्र के रूप में आँखों के सामने तैरने लगता है । फुनगी पर चिड़िया फुदक कर झूला झूल रही हो, की छवि मन पटल पर उभर गई - 
उषा है आई / लाल दुपट्टा ओढ़े / फूल हैं खिले ।
फुनगी  पर / फुदकती चिड़िया / झूले वो झूला ।
पंछी के सुर / दूध केसर घुला / हुआ सवेरा ।
उगा है सूर्य / ज्यों धवल कमल / नीली झील में
गुलमोहर / गगन में उगता / बाल रवि ज्यों 
चुप खड़े हैं  / पलाश-अमलतास /  रोके ज्यों साँस।
अगले वर्ष  / प्रवासी ये बादल  / फिर लौटेंगे ।
कवयित्री ने बहुत संवेदनशीलता और गहनता से हाइकु का शृंगार किया है । ये उत्तम संग्रह कवयित्री की अदभुत काव्य साधना के दर्शन कराता हैं । हाइकु में प्रकृति सौन्दर्य देखते ही बनता है । मौसम के बदलते रूप को निहारते हुए कवयित्री ने जो हाइकु रचे हैं । उनकी सोंधी खुशबू इस संग्रह में महसूस की जा सकती है । मन पंछी -सा जाने कहाँ से क्या–क्या खोज लाता है ।देखिए-
पहली वर्षा / बिखरी सोंधी गंध / धरती पर ।
फूल न पत्ते / कैसा यह मौसम / रूखा जीवन ।
पत्ते सूखते / सूखकर गिरते / नए उगते ।
आया वसंत / झुके पेड़ बौर से / कूके कोयल ।

बड़े शहरों की पीड़ा और अकेलेपन का दर्द , मानव की वेदना , जीवन दर्शन पर लिखे हाइकु पाठक को ठहर कर सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं -
बड़े शहर / उतनी ही दूरियाँ / दिलों के बीच ।
दिल का दर्द /आँखों से बहता / राज कहता ।
मुँदी जो आँखे / खत्म जीवन-लीला / गया अकेला ।
आगे की सोचो / अतीत भूल जाओ / आज में जियो 
यही जीवन / पीड़ा सहनी होती / जो भी मिलती ।
अच्छा होता / मर्यादित जीवन / खुशियाँ देता ।
संकट आता / चरित्र निखरता / बल मिलता ।

संदेशात्मक और आज के परिवेश की तस्वीर खींचते हाइकु बहुत कुछ कह जाते है । संकट में मनुष्य बिखर जाता है पर उसे इन मुश्किलों से लड़कर जो बल मिलता है उससे ही उसे मंजिल का रास्ता मिलता है । कवयित्री मर्यादित जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है । जिससे आज भटका मानव संतोष और शान्ति को पा सके ।

हठीला मन / नहीं यह मानता / छला है जाता ।
तुम्हारे बिन / सालता है रहता / अकेलापन ।
साथ खेलना / पेड़ों पर झूलना / कैसे भूलूँ मैं ।
राहों में काँटे / बिछाए थे जो मैंने / मुझे भी चुभे ।
दिल के तार / बजता ज्यों सितार / तुम जो आए ।
तुम्हारा स्पर्श / ठंडी हवा का झौका / छूता मन को ।

प्रीत के रंग और बचपन की यादें विरह और मिलन का अहसास शिक्षा से परिपूर्ण हाइकु में कवयित्री ने कहा कि अगर किसी की राहों में हम काटें बिछातें है तो  वो हमें स्वयं को भी चुभते हैं ।

पिता का साया / बरगद की छाया / शीतल मन ।
प्रसव पीड़ा / भला कौन सहता / नहीं समता ।
माँ तू मन्दिर / रब तेरे अंदर / देखूँ तुझको ।
कष्ट में होती / उफ़ नहीं करती / धैर्य रखती
तुमसे ही तो / महके अंगना / मेरी बहना ।
अनमोल रिश्तों की शीतल छाया, पिता का साया, माँ की विशालता, रिश्तों में बहता स्नेह  हाइकु से झरता प्रतीत होता है ।
रिश्ते मानव को हमेशा ऊर्जा प्रदान करते हैं । यही जीवन का आधार हैं, नारी की पीड़ा और त्याग को हाइकु द्वारा कहना सरल नहीं  पर कवयित्री ने ये चमत्कार अपनी सशक्त लेखनी से कर दिखाया है । स्पष्टता और सहजता से इतने शानदार हाइकु रचना बहुत बड़ी बात है ।
मेरी प्रिय पुस्तकों में आ.सुदर्शन रत्नाकर जी का हाइकु संग्रह मन पंछी-सा भी शामिल हो चुका है । ये हाइकु संग्रह नवोदित रचनाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत्र है ।

वीर जवान / करते हैं सामना / बन चट्टान ।
महानगर / सागर लहराता / प्यासे मन ।
शोर ही शोर / कंकरीट जंगल / मेरा नगर। 
तुझे सलाम / देते तुम पहरा / करते रक्षा ।

वीर जवानों के अदम्य साहस व  देश भक्ति की भावना झरती काव्य गंगा प्यासे मन को तृप्त कर गई । महानगरों का सजीव चित्र और दिशा हीन मानव का रूप बहुत मार्मिक है ।अंत में मैं कवयित्री को हार्दिक बधाई देती हूँ आपकी लेखनी अविराम चलती रहे, इसी कामना के साथ आपके सुंदर भावों को नमन करती हूँ ।
सुनीता काम्बोज 

मन पंछी-सा (हाइकु -संग्रह): कवयित्री- सुदर्शन रत्नाकर ,मूल्य-200:00 रुपये
पृष्ठ-96 ,संस्करण :2016,प्रकाशक: अयन प्रकाशन , 1/20 महरौली नई दिल्ली-110030


Sunday, 18 February 2018

127-“खोई हरी टेकरी” के जंगल को गाने दो !




'खोई हरी टेकरी’( पर्यावरण -हाइकु): डॉ सुधा गुप्ता। प्रकाशक:पर्यावरण शोध  एवं शिक्षा संस्थान,506/13 शास्त्रीनगर मेरठ-250004; पृष्ठ :64 ; मूल्य: 80 रुपये , संस्करण:2013
साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं अपितु सचेतक और मार्ग दर्शक भी है । तीनों ही विशेषताओं को आत्मसात् किये डॉ सुधा गुप्ता जी द्वारा विरचित पुस्तिका ‘खोई हरी टेकरी’  इसी अवधारणा को पुष्ट करती है ।पर्यावरण के प्रति समाज का उदासीन व्यवहार ,उस पर चिंतन को विवश करते साथ ही समाधान प्रस्तुत करते हाइकु वास्तव में ऐसे अमृत बिंदु हैं जो संवेदनहीन, मृत प्राय समाज में जीवन का संचरण करने में पूर्णत : समर्थ हैं । कवयित्री पहले ही हाइकु से समाज को सचेत करती दृष्टिगोचर होती हैं -
‘चेत मानव / फल फूल छाया है / पेड़ों की माया।’

सौन्दर्य में विचरण करती दृष्टि से समाज कल्याण कभी ओझल नहीं होता .-
‘तरु चिकित्सा /पर्यावरण शुभ /हरीतिमा भी ।’
कहीं निसर्ग पुत्री ने हरी-भरी पुष्पान्विता धरा को सुवसना युवती के रूप में देखा .....
‘हरा लहँगा /फूलों कढी ओढ़नी /सजी है धरा ।’,वहीं दूसरी ओर...जादुई छड़ी लिये परी सी दिखती आज वृक्ष-विहीन होती हुई-ऋतम्भरा धरा लज्जावनत सी दिखाई देती है ।विकास के भ्रम में हरियाली का विनाश करता मानव ऋषि मुनि जैसे वृक्षों के शाप का अधिकारी तथा स्वयं के ही विनाश का कारण बन जाता है -
‘मानव बना /प्रकृति का दुश्मन /स्वयं का विनाश ।’

प्रकृति के कोप से वायु दूषित हो रोगिणी हो गई है ,चिड़ियों का दम घुटता है और वो गीत भूल गई हैं ।शरद पूनो भी गर्द की मारी पीली पड़ गई है -‘शरद पूनो /पीली पड़ी बेचारी /गर्द की मारी ।’
फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या ! मेघ रूठ गए हैं , नदी सूख गई है और कूप बावड़ी भी खाली हैं ।इस बेसुध मानव व्यवहार पर कवयित्री की पैनी दृष्टि  पड़ी है ।सड़कों पर सार्वजनिक नल  जिस तरह खुले पड़े  रहते हैं , यह  स्थिति चिन्ताजनक है  । वह कह उठती हैं -
‘साक्षात काल /पानी की बरबादी/इसे बचाओ ।’

शांत प्रकृति के मधुर संगीत में रमी कवयित्री की प्रवृत्ति को आज का शोर भरा संगीत संगीत नहीं लगता -‘आज का मीत /कान फाड़ संगीत /कल का यम ।’
आज वर्षा की प्रथम फुहार पर सौंधी सौंधी गंध नहीं आती। मौसम के अप्रत्याशित व्यवहार के लिए भी स्वयं मानव व्यवहार एवं आकाशीय प्रदूषण को उत्तरदायी मानती हैं और चेताती हैं -
-वर्षा फुहार /खोई महक ,जो थी /प्राणदायिनी ।
-बदल डाले /ग्रीष्म शीत मानक /सूर्य कोप ने ।
कब चेतोगे /करो रफू चादर /ओजोन पर्त।

    अंत में ..गौरैया ,मोनाल कस्तूरी मृग और यायावर सारस को खोजती कवयित्री गा उठती हैं मधुर रस सिक्त जंगल का गीत -
स्वाधीन मुक्त /सदा मस्ती में डूबा /सबका मीत ।
आत्म विभोर /प्रभु-भक्ति में लीन /सबसे प्रीत ।
तथा साथ ही एक सद्भावना -सन्देश -‘‘मनमौजी है /जंगल को गाने दो / अपना गीत।’  
      सुधा जी की सशक्त लेखनी सहृदयों को वहाँ पहुँचा देती है कि जहाँ उन्हें होना चाहिए ।किम् अधिकम् .....’खोई हरी टेकरी’ को पढ़ना तप्त मरुभूमि में ऐसी हरी टेकरी को पा लेना है; जो अपने सुन्दर ,सुगन्धित पुष्पों से सहृदयों के मन और हिंदी-हाइकु-उपवन को सदा सुवासित करती रहेगी ।
-0-
डॉ ज्योत्स्ना शर्मा ,प्रमुख हिल्स ,एच टावर -६०४ ,छरवाडा रोड ,वापी ,जिला वलसाड -पिन -३९६१९१ -गुजरात (भारत)




Tuesday, 9 January 2018

123 - सुनो तो ज़रा !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा  

सुनो तो ज़रा 
दिल ही तो सुनता 
दिल का कहा ।

हैं अनमोल 
ज़ख़्मों को भर देते 
दो मीठे बोल ।

उधड़ी मिली
रिश्तों की तुरपन
गई न सिली । 

फाँस थी चुभी 
मुट्ठी में अंगुलियाँ 
बँधी न कभी । 

अरी तन्हाई !
शुक्रिया संग मेरे 
तू चली आई ।      



************

Monday, 8 June 2015

निखरी धूप




डॉ•भावना कुँअर को पढ़ना मेरे लिए हमेशा रोमांचक, आत्मीय भाव जगाने वाला और रससिक्त करने वाला रहा है। सद्य प्रकाशित सेदोका- संग्रह ‘ जाग उठी चुभन’ पढ़ा  तो कुछ भाव उमड़ पड़े।हाइगा और हाइकु के रूप में प्रस्तुत हैं-
डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
बिखरी धूप
चेहरा चूमकर
निखरी धूप।
2
व्याकुल चाँद
ढूँढ रहा चाँदनी,
यहाँ छुपी थी !
3
क़ैद तुम्हारे
इन दोनों नैनों में,
सूरज , चाँद ।
4
हुई  मुखर
फिर गीतों की गंगा
बहे  निर्झर ।
-0-