Tuesday, 4 June 2013
Friday, 24 May 2013
उड़कर नहीं देखा ...
डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
बीती हुई बातों से बिछुड़कर नहीं देखा ,
क्यूँ पास में थे पंख फिर उड़कर नहीं देखा |
वो प्यास से तड़पा बहुत शहरी गुरूर में ,
था गाँव में पनघट मगर मुड़कर नहीं देखा |
कुछ भी कठिन नहीं था ,रही इक भूल हमारी ,
बस एक ने भी एक से जुड़कर नहीं देखा |
बेपर्दगी गुरबत का दर्द झेलना पड़ा ,
जब पाँव ने चादर में सिकुड़कर नहीं देखा |
ये नफरतों की आग बुझे भी तो किस तरह ,
आँखों के समंदर ने निचुड़कर नहीं देखा ||
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Sunday, 21 April 2013
बनो न चिड़िया
![]() |
डॉ •ज्योत्स्ना शर्मा
कहीं अकेली कभी न जाना
ये दुनिया बहुत सताती
है ,
तनहाई में अक्सर बिटिया
गुड़िया को यह समझाती
है |
दिखे समाधि गाँधी जी
की
छू आने की जिद मत करना
,
आज़ादी का जश्न देखने
अब जाने की जिद मत
करना
कल तक थी जो दिल वालों
की
अब तो बस दिल दहलाती
है |
तनहाई में अक्सर
बिटिया
गुड़िया को यह समझाती
है |
बचकर भला किधर जाओगी
डर जाओगी ,मर जाओगी
याद रहे ये बात किसी
से
कुछ न कभी लेकर खाओगी
बनो न चिड़िया, बनो शेरनी
ये कह कर दिल बहलाती
है
तनहाई में अक्सर
बिटिया
गुड़िया को यह समझाती
है
-0-
20-04-13
Thursday, 11 April 2013
कहाँ विश्राम लिखा !( नव संवत्सर पर विशेष)
डॉ•ज्योत्स्ना शर्मा
सुन सखी ! कहाँ विश्राम लिखा !
मैंने तो आठों याम लिखा
।
पथ पर कंटक, चलना होगा,
अँधियारों में जलना होगा ।
मन- मरुभूमि सरसाने को
हिमखंडों- सा, गलना होगा ।
शुभ, नव संवत्सर हो सदैव ,
संकल्प यही सत्काम लिखा।।
केवल जीने की चाह नहीं ,
भरनी मुझको अब आह नहीं ।
फूल और कलियाँ मुस्काएँ
गूँजे न कोई कराह कहीं ।
नव आगत तेरे स्वागत में
पल का प्यारा पैगाम लिखा ।।
समय मिलेगा फिर बाँचेगा
मेरी भी कापी जाँचेगा।
रहे हैं कितने प्रश्न अधूरे ;
कितने उत्तर सही हैं पूरे ।
जीवन के खाली पन्नों पर -
साँसों का बस संग्राम लिखा ।।
मैंने तो आठों याम लिखा
,
सुन सखी ! कहाँ विश्राम लिखा !
-0-Monday, 1 April 2013
Thursday, 7 March 2013
धूप-सी तुम भी खिलो..(महिला दिवस पर)..
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
सूरज ने कल मुझसे कहा बात बात में
धूप-सी तुम भी खिलो.. तो मेरे साथ में
मैं भी उसके साथ हँसी और खिल गई
उजली चदरिया बनूँ बुनकर से मिल गई
सूरज ने कल मुझसे कहा बात बात में
धूप-सी तुम भी खिलो.. तो मेरे साथ में
मैं भी उसके साथ हँसी और खिल गई
उजली चदरिया बनूँ बुनकर से मिल गई
लो चाँदनी भी मैं हूँ...
औ.....मै ही धूप हूँ ।
तामसी निशा का भी...
उजला सा रूप हूँ ।
जल ही उठेगे दीप , गाओ , दीप राग हूँ
मान लो दिनकर के भी मैं मन की आग हूँ
मुझसे विलग सुख सृष्टि की अवधारणा कहाँ !
संजीवनी समाज की.....खिलती सतत यहाँ
स्वप्न हो सृजन... कि ..... अधूरे रहोगे तुम ,
साथ मेरा हो सदा................पूरे रहोगे तुम।
कामना इतनी करूँ.... कि दीप्त हों दिवाकराः
मन मेरा न कह उठे "रमन्ते अत्र निशाचराः"
"..सभ्य ,सुसंस्कृत और सुंदर समाज के निर्माण की नींव बन जायें...महिला दिवस के अवसर पर हार्दिक शुभ कामनायें "
.......डॉ0ज्योत्स्ना शर्मा..........जल ही उठेगे दीप , गाओ , दीप राग हूँ
मान लो दिनकर के भी मैं मन की आग हूँ
मुझसे विलग सुख सृष्टि की अवधारणा कहाँ !
संजीवनी समाज की.....खिलती सतत यहाँ
स्वप्न हो सृजन... कि ..... अधूरे रहोगे तुम ,
साथ मेरा हो सदा................पूरे रहोगे तुम।
कामना इतनी करूँ.... कि दीप्त हों दिवाकराः
मन मेरा न कह उठे "रमन्ते अत्र निशाचराः"
"..सभ्य ,सुसंस्कृत और सुंदर समाज के निर्माण की नींव बन जायें...महिला दिवस के अवसर पर हार्दिक शुभ कामनायें "
Thursday, 14 February 2013
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