Friday, 2 May 2014

कजरारी अँखियाँ करें ......



डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

(बस चित्र के भाव पर .....एक प्रस्तुति ......)

कजरारी अँखियाँ करें ,आज वार पर वार।
हमसे जीतोगे पिया ,पाओगे तुम हार।।

चमकी चित में चाँदनी ,दम-दम दमके रूप ,
पाई जब से देह ने ,तेरे नेह की धूप।

यूँ तो तुमसे मिल हुईं ,सब आशा साकार ;
हमसे जीतोगे पिया ,पाओगे तुम हार।।

दुनिया ने सपने बुने ,हमने बुन ली प्रीत ,
ड्योढ़ी लँघी न लाज की , छोड़ न पाई रीत।

दुख देकर चाहा नहीं ,सुखों भरा संसार ;
हमसे जीतोगे पिया ,पाओगे तुम हार।।

अब किससे शिकवा करें ,कहाँ करें फरियाद ,
कौन पहर आई नहीं ,हमें तुम्हारी याद।

पलक मूँद,मन , कैद कर! हुकुम करे सरकार ;
हमसे जीतोगे पिया ,पाओगे तुम हार।।
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Thursday, 1 May 2014

नमन !!!

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

रचता सकल समाज को ,सारे सुख आराम |
उस कर्मठ कर को करूँ ,सादर नमन , प्रणाम ||

शठ से तो शठता भली ,भले-भलाई आज |
तेरे-मेरे मन जिएँ , सदा वीर शिवराज ||

योगी हों श्री कृष्ण से ,मर्यादा में राम |
दुष्टों के प्रतिकार को ,नमन हे परशुराम !!

'मजदूर दिवस' ,'शिवाजी जयंती ' और 'परशुराम जयंती ' के अवसर पर ..
उनके लिए सादर नमन-वंदन ..और ....

आपके लिए बहुत शुभ कामनाओं के साथ ..

ज्योत्स्ना शर्मा

Saturday, 12 April 2014

ख़ुशबू से तर ......


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

चाक जिगर पर ख़ुशबू से तर देखे हैं ,
हमने उनके.......काँटों में घर देखे है |

सिर्फ दुआएँ लब पर ममता , दुनिया ने ,
उस मूरत में............पीर-पयंबर देखे हैं |

जिन पर अक्सर होता है विश्वास बहुत ,
उन हाथों में.........हमने खंजर देखे हैं |

खोला पिंजर ,कल जिसको आज़ाद किया ,
उस चिड़िया के.......कतरे से पर देखे हैं |

हाफ़िज़ तक महफूज़ नहीं इन आँखों ने ,
जाने कैसे – कैसे............मंज़र देखे हैं |

  
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Saturday, 15 March 2014

हो फिर मुखरित प्यार !!

                               चित्र गूगल से साभार 
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 


होली में अब होम दें , कलुषित भाव विकार |
मन से मन सबके मिलें , हो फिर मुखरित प्यार ||१


कुछ भूलों को भूल कर , चलो मिला लें हाथ |
जीवन भर क्या कीजिए , नफ़रत लेकर साथ ||२

लो सतरंगी हो गया , मन भी तन के साथ |
कैसे जादूगर पिया , रंग लियो नहि हाथ ||


बौराई रुत फाग सी , मैं भूली सब रीत |
ज्यों-ज्यों सिमटी आप में ,त्यों-त्यों छलकी प्रीत ||


गुँझिया से मीठे लगें ,गोरी तेरे बोल |
गारी पिचकारी हुई , रंग माधुरी घोल ||


कहाँ सुहाए चंद्रिका , मन तो हुआ चकोर |
राधे सबसे पूछतीं , कित मेरा चित चोर ||


कान्हा कैसी बावरी , मूढ़ मति भई आज |
नैना चाहें देख लें ,डरूँ न छलके राज ||


कितना छुपकर आइये ,गोप-गोपिका संग |
राधे से छुपते नहीं , कान्हा तोरे रंग ||

होली की हार्दिक शुभ कामनाओं के साथ ......

ज्योत्स्ना शर्मा 

Friday, 7 March 2014

एक हाथ में चाँदनी !!!

                                      चित्र गूगल से साभार 


इस बेमकसद शोर में,कलम रही जो मौन |
तेरे-मेरे दर्द को ,  और कहेगा कौन ||१ 


शब्दों में आराधना , अर्थ मिला बाज़ार |
अकथ कथा है पीर की , घर में भी लाचार ||

जीवन की संजीवनी , आप करे संघर्ष |
देख दशा ,तेरी दिशा , शोक करें या हर्ष ||


तितली , चिड़िया , मोरनी ,तुलसी नहीं ,न दूब
एक जहाँ इनसे अलग ,रचा आपने खूब ||

आज अँधेरों को चलो , दिखला दें यह रूप |
एक हाथ में चाँदनी  ,एक हाथ में धूप ||


लिखना है तुझको यहाँ ,खुद ही अपना भाग |
सरस सृजन की जोत तू , कलुष-दहन की आग ||

न्याय और अन्याय को , रच ऐसा संसार |
इत बरसे रस की सुधा , उत बरसे अंगार ||

महिला दिवस पर ...
हार्दिक शुभ कामनाओं के साथ ....
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
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Sunday, 2 March 2014

मोहन मेरे !!!

                                   चित्र गूगल से साभार 

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 

१ 
मीरा नहीं हूँ मैं राधा नहीं हूँ ,
बस एक ज़र्रे से ज़्यादा नहीं हूँ |

या तुम हो मेरे या मैं तुम्हारी ,
मोहन मेरे भाव आधा नहीं हूँ |

दिन-रैन जिसने घुमाया है मुझको
कैसे कहूँ उसका प्यादा नहीं हूँ |

जिसको ज़रा बेरुखी तोड़ देगी ,
ऐसा मैं कोई इरादा नहीं हूँ |

मंज़िल को मुझसे बहुत उन्सियत है ,
ख़ुद से ख़ुदी का मैं वादा नहीं हूँ |



हमने ख़्वाब सुहाने देखे ,
अपने या बेगाने देखे |

गीतों की महफ़िल थी लेकिन ,
फैले बस वीराने देखे |

कतरे-कतरे में सागर था ,
सागर में पैमाने देखे |

हैरत है पर सच्चाई पर ,
कुछ लुटते दीवाने देखे |

रौशन एक शमां खुद्दारी ,
जल मरते परवाने देखे |

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Thursday, 27 February 2014

दो रचनाएँ .....

एक 

आवाजाही जारी है
 ,
फिर हंगामा तारी है 

जाने कैसा रोग लगा ,
जाने क्या बीमारी है 


नस -नस में घोटाला है ,
रग-रग में मक्कारी है 


क्या जाना क्या अनजाना
 ,
पंजे में ऐयारी है
 


अंधे को अंधा कहते
 ,

अब तो विपदा भारी है 

बुझे दिए में  तेल भरो
 ,
इसमें क्या  हुशियारी है 

काल कलम से पूछ रहा
 ,
तेरी किससे यारी है 

दो 

जब से वो मशहूर हुए ,
थोड़ा -सा मग़रूर हुए ।

आसमान से की बातें ,
धरती से दूर हुए ।

जाम मिला जब सत्ता का ,
खूब नशे में चूर हुए ।

गैरों को अपनाते क्या ,
अपनों से भी दूर हुए ।

चुप रहना था, बोल उठे ,
आदत से मजबूर  हुए ।

नूरे इलाही छोड़ गया ,
यूँ आखिर बेनूर हुए ।
-0-

डॉ ज्योत्स्ना शर्मा