Wednesday, 3 June 2015
Monday, 1 June 2015
गर्मी के तेवर !!!!
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
1
1
दिन ने
खोले नयन जब ,बड़ा
विकट था हाल ,
पवन,पुष्प ,तरु ,ताल ,भू ,सबके सब बेहाल।
पवन,पुष्प ,तरु ,ताल ,भू ,सबके सब बेहाल।
सबके सब बेहाल ,कुपित कुछ लगते ज़्यादा ,
ले आँखों अंगार , खड़े थे सूरज दादा।
घोल रहा विष कौन .गरज कर तब वह बोले ,
लज्जित मन हैं मौन , नयन जब दिन ने खोले।।१
2
गर्मी के तेवर बढ़े ,और बिजुरिया गोल ,
शरबत , लस्सी ,छाछ पर , चल अब हल्ला बोल।
चल अब हल्ला बोल , आम सा फल नहीं दूजा ,
भाया है तरबूज , और मीठा खरबूजा।
नींबू , पना , सलाद , भरे तबियत में नर्मी ,
वश में हों हालात , शांत हो थोड़ी गर्मी ।।२
-0-
(चित्र गूगल से साभार )
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Wednesday, 27 May 2015
Monday, 20 April 2015
वो पहले का गाँव !
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
झूले,गीत ,बहार सब ,आम,नीम की छाँव |
हमसे सपनों में मिला ,वो पहले का गाँव ||१
सूरज की पहली किरन ,पनघट उठता बोल |
छेड़ें बतियाँ रात की , सखियाँ करें किलोल ||२
गगरी कंगन से कहे ,अपने मन की बात |
रीती ही रस के बिना ,बीत न जाए रात ||३
अमराई बौरा गई , बहकी बहे बयार |
सरसों फूली सी फिरे ,ज्यों नखरीली नार ||४
कच्ची माटी ,लीपना ,तुलसी वन्दनवार |
सौंधी-सौंधी गंध से ,महक उठे घर-द्वार ||५
बेला भई विदाई की ,घर-घर हुआ उदास |
बिटिया पी के घर चली ,मन में लिए उजास ||६
सोहर बन्ने गूँजते ,आल्हा ,होली गीत |
बजे चंग मस्ती भरे ,कण-कण में संगीत ||७
संध्या दीप जला गई ,नभ भी हुआ विभोर |
उमग चली गौ वत्सला ,अपने घर की ओर ||८
बहकी-बहकी सी पवन ,महकी-महकी रात |
नैनन-नैन निहारते ,तनिक हुई ना बात ||९
नींद खुली ,अँखियाँ हुईं ,रोने को मजबूर |
लेकर थैली ,लाठियाँ ,गाँव नशे में चूर ||१०
जात-धर्म के नाम पर ,बिखरा सकल समाज |
एक खेत की मेंड़ पर , चलें गोलियां आज ||११
कैसे मैं धीरज धरूँ ,दिखे न कोई रीत |
कैसे पाऊँगी वही ,सावन ,फागुन , गीत ||१२
दिए दिलासा दे रहे ,रख मन में विश्वास |
हला! न हिम्मत हारिए ,जलें भोर की आस ||१३
तम की कारा से निकल ,किरण बनेगी धूप |
महकेगी पुष्पित धरा ,दमकेगा फिर रूप ||१४
चित्र गूगल से साभार
Thursday, 16 April 2015
रस-निर्झर !
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
ताँका
1
बुहार दिए
निराशा के पत्रक
जा पतझर !
सुधियों की वीणा है
पाया रस निर्झर !
2
तुम सूरज !
मैं रससिक्त धरा
खूब तपा लो,
मेरे मन यादों का
गुलमोहर झरा !
3
अरी पवन !
ली खुशबू उधार
कली-फूल से
ज़रा कर तो प्यार
न कर ऐसे वार !
4
बीज खुशी के
मैं बो आई थी कल
उग आएँगे
कुछ पौधे प्यारे-से
प्रेम-रस-भीने से !
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