डॉ• ज्योत्स्ना
शर्मा
नेक फ़रिश्ते से हुई, जब भीतर
पहचान ।
तभी सफल पूजन-भजन ,रोज़े या रमज़ान।।१
भक्ति भाव मन में लिये ,दान,धर्म कर जाप ।
रोज़े और ज़कात से, काट जगत
के पाप ।।२
सबको 'प्यारे चाँद'
की , हो जाए गर दीद।
होली ,दीवाली अभी ,खूब मने फिर ईद ।।३
ज़ख़्म सिए ,उनके किए,पूरे कुछ अरमान ।
मुझको ईदी में मिलीं , ढेर दुआ ,मुस्कान ।।४
चाँद वही,सूरज वही,गगन,पवन वह नूर ।
धरती किसने बाँट दी, दिल से
दिल क्यों दूर ।।५
मेहनत करते हाथ को,बाक़ी है
उम्मीद ।
रोज़-रोज़ रोज़ा रहा , अब आएगी ईद ।।६
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(चित्र गूगल से साभार)




