Thursday, 30 July 2015
Sunday, 26 July 2015
वंदन-अभिनन्दन !
करगिल के अमर सपूतों के प्रति शत-शत नमन के साथ
- ज्योत्स्ना शर्मा
मुश्किलों से जूझते हैं और रहते
हैं मगन भी ,
हौसलों के पंख लेकर ,रोज छूते हैं गगन भी |
जिस तरह से कंटकों में, फूल महकाएँ चमन को ;
सींच कर खुशियाँ लहू से ,वो सजाते हैं वतन भी ||
भारत माता के चरणों का ,हम वंदन हो जाएँगे ,
ओजस्वी मन और वचन का, अभिनन्दन हो जाएँगे |
घिस-घिस महकें माथे उनके ,इतनी सी है अभिलाषा ;
नित्य मात के पूजन-अर्चन में
चन्दन हो जाएँगे ||२
*********~~~~~~~*********
Tuesday, 21 July 2015
एक लड़की !
प्यारी बेटियों को समर्पित ...एक कविता ......
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
क्या कहें
क्या कमाल करती है,
वक़्त से
भी सवाल करती है ।१
बेफिकर
ख़ुद ,जहान के ग़म पे,
आँख रो-रो
के लाल करती है ।२
खींच कर
कौन खुश लकीरें ये ?
हाय ! कहकर
मलाल करती है।३
खूब हँसती
है तो कभी रोकर ,
रीते आँखों
के ताल करती है।४
चोट खाकर
भी ,मीठी बातों से,
देखिए तो !
निहाल करती है।५
प्यार
अम्माँ से बहुत ,बाबा का,
दिल से
कितना ख़याल करती है।६
आज चर्चा
है इन हवाओं में
काम वो
बेमिसाल करती है ।।७
एक लड़की है दिल की बस्ती में ,
हक़ से रहती ,धमाल करती है।८
*****~~~~~*****
(चित्र गूगल से साभार )
Friday, 17 July 2015
खूब मने फिर ईद !
डॉ• ज्योत्स्ना
शर्मा
नेक फ़रिश्ते से हुई, जब भीतर
पहचान ।
तभी सफल पूजन-भजन ,रोज़े या रमज़ान।।१
भक्ति भाव मन में लिये ,दान,धर्म कर जाप ।
रोज़े और ज़कात से, काट जगत
के पाप ।।२
सबको 'प्यारे चाँद'
की , हो जाए गर दीद।
होली ,दीवाली अभी ,खूब मने फिर ईद ।।३
ज़ख़्म सिए ,उनके किए,पूरे कुछ अरमान ।
मुझको ईदी में मिलीं , ढेर दुआ ,मुस्कान ।।४
चाँद वही,सूरज वही,गगन,पवन वह नूर ।
धरती किसने बाँट दी, दिल से
दिल क्यों दूर ।।५
मेहनत करते हाथ को,बाक़ी है
उम्मीद ।
रोज़-रोज़ रोज़ा रहा , अब आएगी ईद ।।६
~~~~~~******~~~~~~
(चित्र गूगल से साभार)
Friday, 10 July 2015
बाँस-उपवन
पुनः पढ़िएगा अनिता मंडा जी को ......
- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
नूर की एक नदी जो बही
तुम्हारी आँखों से मेरी आँखों तक
सींचती हुई कितने ही सपनों को
नित्य नवीन कोंपलें फूटतीं
उग आया एक विशाल बाँस-वन
जुड़ती गई अनुभवों की गाँठें
फैलता गया हरा-भरा सुन्दर उपवन
मेरा प्रश्न नहीं तुमसे कि
क्यों छोड़ दिया तुमने सप्रयास
सींचना सुन्दर बाँस- वन को
क्यों सूखने दिया मेरी सुधियों से
भरे कोमल हृदय को?
नहीं तुमसे कोई प्रश्न;
क्योंकि नहीं ज्ञात मुझे
प्रश्न का कोई अधिकार भी
मेरा है या नहीं?
पर एक प्रार्थना है-
समय के झंझावात से
रगड़ खा सूखे बाँस
न पकड़ पायें आग;
क्योंकि आग करती है विनाश
फिर चाहे हृदय में ही हो।
आग कर देती है राख
स्मृतियों के अवशेष को।
राख की कालिख़ में
नहीं उपजती नवीनताएँ।
वक़्त की तपिश से सूख
समाप्त हो गया है हरापन
रस की एक-एक बूँद
सूख समा गई है
उसके खोल में।
अंदर से भी दिखाई पड़ता है
खोखला।
पर निरर्थक नहीं है
उसका खोखलापन।
उसके आवरण ने पीया है
रस इसीलिए शायद
उससे निकलने वाले
स्वर हैं रसमय।
एक आस बाकी है
जैसे बाँस के हृदय छिद्रों से
निकलने वाले स्वर
करते हैं संसार को आनंदित
तुम भी स्वयं को वैसा ही बनाना।
पर ध्यान रहे सूखे बाँस के
फाँस भी होती है
चुभे तो सिहरन फैल जाती है
हृदय को चीरती हुई
एड़ी से चोटी तक।
तुम कभी फाँस मत बनना
इस प्रार्थना का अधिकार
कभी नहीं छुटेगा मुझसे।
तुम्हारी आँखों से मेरी आँखों तक
सींचती हुई कितने ही सपनों को
नित्य नवीन कोंपलें फूटतीं
उग आया एक विशाल बाँस-वन
जुड़ती गई अनुभवों की गाँठें
फैलता गया हरा-भरा सुन्दर उपवन
मेरा प्रश्न नहीं तुमसे कि
क्यों छोड़ दिया तुमने सप्रयास
सींचना सुन्दर बाँस- वन को
क्यों सूखने दिया मेरी सुधियों से
भरे कोमल हृदय को?
नहीं तुमसे कोई प्रश्न;
क्योंकि नहीं ज्ञात मुझे
प्रश्न का कोई अधिकार भी
मेरा है या नहीं?
पर एक प्रार्थना है-
समय के झंझावात से
रगड़ खा सूखे बाँस
न पकड़ पायें आग;
क्योंकि आग करती है विनाश
फिर चाहे हृदय में ही हो।
आग कर देती है राख
स्मृतियों के अवशेष को।
राख की कालिख़ में
नहीं उपजती नवीनताएँ।
वक़्त की तपिश से सूख
समाप्त हो गया है हरापन
रस की एक-एक बूँद
सूख समा गई है
उसके खोल में।
अंदर से भी दिखाई पड़ता है
खोखला।
पर निरर्थक नहीं है
उसका खोखलापन।
उसके आवरण ने पीया है
रस इसीलिए शायद
उससे निकलने वाले
स्वर हैं रसमय।
एक आस बाकी है
जैसे बाँस के हृदय छिद्रों से
निकलने वाले स्वर
करते हैं संसार को आनंदित
तुम भी स्वयं को वैसा ही बनाना।
पर ध्यान रहे सूखे बाँस के
फाँस भी होती है
चुभे तो सिहरन फैल जाती है
हृदय को चीरती हुई
एड़ी से चोटी तक।
तुम कभी फाँस मत बनना
इस प्रार्थना का अधिकार
कभी नहीं छुटेगा मुझसे।
-0-
Sunday, 14 June 2015
महफिलें याद की !
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
1
पुरवा में पन्ने उड़े , पलटी याद किताब
।
कितना मन महका गया , सूखा एक गुलाब
।। ..
दर्द,महफिलें याद कीं , खुशियों के अरमान ।
मुट्ठी भर औकात है , पर कितना सामान ।।
3
सहने को सह जाएँगे , पत्थर बार हज़ार
।
4
माथे का चन्दन हुई , उसके पग की धूल ।
मनुज मनुजता हित बढ़ा , केवल निज सुख भूल ।।
बीती बातें भूल कर , चलो मिला लें हाथ ।
जीवन भर क्या कीजिए ,नफ़रत लेकर साथ ।।
रिश्ते कल पूछा किए ,हमसे एक सवाल ।
खुद ही सोचो बैठ कर , क्यों है ऐसा हाल ।।
******&&&&*****
(चित्र गूगल से साभार )
Thursday, 11 June 2015
सृष्टि-सृजन
निवेदन !
राजस्थान में
जन्मी ,पली-बढीं ,हिन्दी एवं इतिहास
में स्नातकोत्तर स्तरतक शिक्षा प्राप्त सुश्री अनिता मंडा
अपने सुरुचि पूर्ण लेखन से साहित्य-साधना में संलग्न हैं।आज उनकी एक ऐसी ही रचना
प्रस्तुत है।आशा करती हूँ आपका स्नेह-आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करेगी |
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा
सृष्टि-सृजन
एक ख़ामोशी की
नदी
जमकर
बन
गई हिम शिखर
तुम्हारे
भीतर
एक
आँच
सुलगा
रही है
मुझे
भी सदियों से
इस
आँच को छुपाए
बनते
हुए राख
क्षण-प्रतिक्षण
तड़प-
झुलस
नहीं
बुझने दी आँच।
इसी
प्रतीक्षा में
कि
एक दिन
ये
आँच
पिघला
देगी हिमशिखर
मुक्त्त
हो जाओगे तुम
हृदय
-भार से।
पर यह आभास रहे
हिमशिखर
आँच के
इतना
ही पास रहे
बहे
नदी बनकर
सैलाब
बनकर नहीं।
सृष्टि-सृजन
हो बाधित
यह
मुझे स्वीकार नहीं।
खिले
सृष्टि
खिले
वसन्त
नदी-
नीर लेकर
खिले
धरा।
एक
टहनी जिस पर
खिले
हैं स्मृति -पुष्प
आओ
हिलाएँ मिलकर
चुन
लें फूल
आधे
तुम्हारे
आधे
मेरे।
धरती
पर पाँव जमाएँ
छुएँ
आसमाँ के तारे
पा लें पूर्णता
उस
समग्र का अंश
अनुभूत
हमें
करें
निर्मित संतुलन
प्रकृति के साथ।
-0-
Subscribe to:
Posts (Atom)






