Wednesday, 15 April 2026

189- हर मन की चाहना


हर मन की चाहना है करूँ काम राम का

जुटना सभी को ,वक्त नहीं है आराम का

भक्ति, ओज , वीर तभी आ विराजते
समवेत स्वर में गूंजता जब नाम राम का  ।।

इतिहास कह रहा है ज़रा सी न भूल हो
स्वार्थ की तनिक सी भी मन पर न धूल हो
शृंगार करें मिलके सभी राष्ट्र-धर्म का
हाथ में सद्भाव का सुन्दर-सा फूल हो ।।

अपनी मोहब्बतों को उसके नाम लिख दिया
बाकी की ख्वाहिशों को तो आराम लिख दिया
हो कर्म हमारे सभी वतन के वास्ते
और धड़कनों पे हमने अपनी राम लिख दिया ।।

आज्ञा पिता की राज को भी छोड़ते है राम
मर्दन करें दुष्टों का दर्प तोड़ते हैं राम
केवट, निषादराज,कपि, शबरी के हो गए
जब  बाँटती है दुनिया तब जोड़ते हैं राम।।

वो आ गए हैं जानकर दिल को आराम है
फुरसत नहीं जरा भी मुझे कितना काम है
पूछते हो क्या भला आखिर वो कौन हैं
बसते थे रोम-रोम में साकार राम हैं ।।

प्रतीक्षा की बहुत आखिर घड़ी सुन्दर ये आई है
बधाई है ,  बधाई है सकल जग को बधाई है
अयोध्या से लिपट खुशियाँ खुशी से नाचतीं देखो
सुदर्शन राम की सूरत नयनों में समाई है  ।।

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 







Tuesday, 22 July 2025

188- अभिनंदन


                           (चित्र गूगल से साभार)


यूँ ही .....
थाम कर हाथ
बेख्याली में
चल पड़ी सदी
ठगी सी खड़ी है
सप्तपदी ।1
***********
सकरी गलियाँ
सीलन भरे अँधेरे
धूप का स्वाद
कैसे बताएँ
लील गईं सूरज
अट्टालिकाएँ ।2
***********
हाथ कुछ आता नहीं
बेचैन कर जाते हैं
जाने ये सपने
क्यों आते हैं !3
********
हे ईश्वर !
उसकी
तृप्ति भरी शाम हो
सुखद सवेरा हो
जो बचे उसकी चाहत से
वही, बस वही मेरा हो ।4
**********
रिश्ता तो बस ऐसे
बनाया और निभाया जाए
जैसे टूटे सपनों की किरचें
चुभती हैं आँखों में
और ....
घाव दिल पर उभर आए ।5
************
नजदीकियों को
कर दिया दूर
बढ़ा दिया
दूर वाला प्यार
मोबाईल फोन ने
इतना किया उपकार ।6
***********
मत मिलो मुझसे
मत प्यार बरसाओ
बस इतना कर दो
आंखें मूँदूं तो
तुम बस तुम नज़र आओ ।7
***********
मैंने किया उसका
अभिनंदन !
नज़र भी उतारी है
प्रेम से भरी एक कविता
नफरत के महाकाव्यों पर
भारी ! बहुत भारी है ।8
*************
सुन्दर इच्छाओं के
गुलाबों से
मन को कुछ ऐसे
सजाया जाए
फिर ....
कर्मों की माला
बनाकर धरा को
महकाया जाए.....।9
********
अनुनय की धरा ने
गिड़गिड़ाई
नहीं माना सागर
खूब गरजा, बरसा,
"तुमने अपने बच्चों को
अक्ल नहीं सिखाई" ।10
*********
सबको भाती है
मुस्कानों की बंदनवार
कोई-कोई सुनता है
भीतर के मौन का
हाहाकार ।11
*********
मसले पड़े हैं फूल,
कलियाँ ,
पत्तियाँ आहें भरतीं हैं
हैरत है !
तितलियाँ फिर भी
उड़ान भरतीं हैं ।12
**********
ठोका , पीटा , तराशा
कभी तपाया , गलाया
फिर मुस्कराया ....
तूने मुझे
मैंने तुझको बनाया।13
***********
आँखों में अनुरोध लिए
उसने कहा
माँ! मेरा जन्मदिन
ऐसे मनाना
आज आप मुझे
अकेले मत सुलाना।14
**********
उन्होने
जलसे में बाँटकर
शब्दों की मिठाई
नन्हे रामू की
खूब फटकार लगाई
क्यों रे !
तुझे अब तक
कार धोनी न आई !15
**********
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
वापी




Monday, 30 December 2024

187- खिलती खूब बहार मिले !


 स्नेहिल मित्रों , बन्धुजनों को 

खिलती खूब बहार मिले,

सुन्दर, सरस, मधुर हो जीवन 

स्नेहपूर्ण व्यवहार मिले ।

नयी मंजिलें, नये शिखर हों 

नित-नित हो आगे बढ़ना ;

पग-पग पर पथ सरल रहे , हर

कठिनाई को हार मिले ।।

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 


Thursday, 26 December 2024

186-छाया है कोहरा घना !




  (चित्र गूगल से साभार )


छाया है कोहरा घना
मन है अनमना !

चमकीं हैंं लाइटें
गाड़ियों का शोर है
जाने दुपहरिया है ?
साँझ है कि भोर है  ?
धुंध का वितान-सा तना
मन है अनमना !

देखो नज़दीकियाँ  भी
आज हुईं ओझल
सँझा को सांसे भी
लगतीं हैं बोझल
मौसम भी दे यातना
मन है अनमना !

धीरे-धीरे घट जाए
फिर दिन की पीर
एक किरन आ जाए
कुहरे को चीर
इतनी सी है चाहना 
न रहे अनमना  !

छाया है कोहरा घना
मन है अनमना ।।

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

Wednesday, 1 November 2023

185- अर्घ्य प्रेम का

 



दिल ये चाहे
बिखरा दूँ कलियाँ
राहों में तेरी ।

न आँसू तुम
कजरा भी नहीं हो
नैनों मे बसे ।

चिरसंगिनी
खुशियाँ हों तुम्हारी
दुआ हमारी ।

लाज-चूनर
उमंगों के कंगन
प्रेम का अर्घ्य ।

सौभाग्य माँगूँ
खुशियों की पायल
बजती रहे ।

हों पूरे सदा-
नयनों में सजे जो,
ख्वाब तुम्हारे ।

तेरे प्यार ने
नहीं बुझने दिया
जीवन-दिया ।

मेरी दुआएँ
सजनी सदा संग
पिया का पाएँ ..... करक चतुर्थी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ 💐💐

ज्योत्स्ना 




Tuesday, 5 September 2023

184- शिक्षक खेवनहार !


 

मात-पिता शिक्षक प्रथम , दूजे शिक्षाधाम
तीजे जड़-जंगम जगत , सबको करूँ प्रणाम ।।

नन्हें पौधों को दिया, स्नेह सींच विस्तार ।
माली बनकर आपने , सबको दिया सँवार ।।

भ्रम के अँधियारे घिरें , सूझे आर न पार ।
देकर दीपक ज्ञान का , करते पथ उजियार ।।

उच्च लक्ष्य सन्धान कर , करें राष्ट्र निर्माण ।
महिमा गुरुवर आपकी , गाते वेद-पुराण।।

लोभ , मोह , छल छद्म का ,सागर है संसार  ।
जीवन नैया बढ़ चले , शिक्षक खेवनहार ।।

निर्माता हैं राष्ट्र के , रविकर-निकर समान ।
सदा हृदय से कीजिए, शिक्षक का सम्मान ।।

व्यस्त रहें शिक्षक सदा, हो कोई अभियान ।
अध्यापन का दीजिए , समय इन्हें श्रीमान ।।


भारत के पूर्व राष्ट्रपति , प्रसिद्ध शिक्षाविद्, महान विचारक डॉ.  सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की जयन्ती पर उन्हें शत् शत् नमन तथा सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐🙏💐


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा






Tuesday, 4 July 2023

183- वो मेरी बातों में उलझें !

 

                               (चित्र गूगल से साभार)

1

मेरी मानो हो तो ऐसा कर देना
उसके सारे घावों को तुम भर देना ।

आकर जिसमें चैन मिले , सुख पाए मन
हर बन्दे को ,अपना ऐसा घर देना  ।

पंख कटे थे कैद रहे सपने जिसके
साथ-साथ अम्बर के उसको पर देना ।

मामूली बातों पर झगड़ा ,खूँ रेज़ी
थोड़ा सा तो नरम-नरम तेवर देना  ।

वो मेरी बातों में उलझें, रुक जाएँ
मुझको भी कुछ ऐसा मीठा स्वर देना ।


2

खुश हैं शोर मचाने वाले ,क्या कहिए !
चुप हैं राह दिखाने वाले , क्या कहिए !

दीख रहे हैं  ,अचरज ! नेत्रविहीनों को,
सूरज की आँखों पर जाले , क्या कहिए !

खूब कसीदे पढ़ते रात घनेरी के ,
हाथ धूप के लगते काले ,क्या कहिए !

हमने सोचा था कुछ होंगे महफिल में
बेसुध की सुध लेने वाले, क्या कहिए !

बातें करते रहते हैं गंगाजल की
पथ चुनते मदिरालय वाले , क्या कहिए !

उनको डर जब पर्त उधेड़ी जाएगी
निकलेंगे कितने घोटाले , क्या कहिए !

करनी है सो भरनी होगी तय है मन ,
चाहे कितनी जुगत भिड़ा ले, क्या कहिए !

फेंक रहा था जाल मछेरा , मत जाते
तड़प रहे अब कौन निकाले, क्या कहिए !

नफरत मत दो , प्रेम भरो , सच्चाई दो
बच्चों के मन भोले- भाले , क्या कहिए !


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

Saturday, 13 May 2023

182-बस नाम तुम्हारा !



जन्मा मुझे ,मैं जो भी हूँ उसने ही बनाया
खाना, लिखना , बोलना उसने ही सिखाया
सही गलत की उसने ही पहचान बताई
चलना है मुझे जिसपे सही पथ भी दिखाया ।।1
        **************
मुस्कुराके लाड़ से दुलारती भी है
बालों को बड़े प्यार से संवारती भी है
दो पल उदास वो मुझे रहने नहीं देती
करती हूँ गल्तियां तभी फटकारती भी है।।2
         ***************
छाए निराशा उसने गले से लगा लिया
आँचल में अपने प्यार से कितने छुपा लिया
अपने लिए किसी से कुछ भी मांगती न थी
बच्चों के लिए घर को ही सिर पर उठा लिया ।।3
         **************
अपनी चाहतों को जिया ही नहीं कभी
पीड़ा का अपनी ज़िक्र किया ही नहीं कभी
हौंसलों को मेरे उसने पंख दे दिए
सपनों पे अपने ध्यान दिया ही नहीं कभी ।।4
         **************
सबके मनों को जानती है मन की नेक है
सब मोतियों को जोड़ता धागा वो एक है
भेद सबके मौन में रखती लपेटकर
तब ही तो सबके मन की मधुरतम सी टेक है।।5
           *************
साए में जिसके प्यारी धूप प्यारी शाम है
जो सबके लिए सारे सुखों का ही धाम है
पुकारते हैं मुश्किलों में बस सदा ही 'माँ' !
आता है याद जो वो तुम्हारा ही नाम है ।।6

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 



Sunday, 2 April 2023

181- है सुन्दर उपहार ज़िंदगी !


 

है  सुन्दर  उपहार ज़िंदगी

सुख-दुख का भण्डार ज़िंदगी ।


तेरा- मेरा प्यार ज़िंदगी 

मीठी- सी तकरार ज़िंदगी ।


खो बैठे धन अमर-प्रेम का 

तब तो केवल हार ज़िंदगी ।


देती जो मुसकान , धरा का-

करती है शृंगार ज़िंदगी ।


काँटे-कलियाँ बीन-बीनकर

रचे सुगुम्फित हार ज़िंदगी।


इधर कुआँ है उधर है खाई

दोधारी तलवार ज़िंदगी ।


खूब मनाए मन का उत्सव 

बन जाए त्योहार ज़िंदगी ।


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

(चित्र गूगल से साभार)




Tuesday, 7 March 2023

180-लौटी जो घर

(चित्र गूगल से साभार) 
 1 
कितना गुस्सा थी मैं 
किसी की नहीं सुनी 
मन का पहना , मन का खाया 
कितना शोर मचाया 
खूब भटकी 
अपनी 'आज़ादी' के साथ
 लौटी जो घर.... न जाने किन 
ख्यालों में खो गई 
और फिर .... तुम्हारे कन्धे पर 
सिर रखकर सो गई । 
 2 
 सकरी गलियों में 
बड़े-बड़े वाहन 
अटक ही जाएँगे 
 सुनो ! मन को विस्तार दो 
 तभी बड़े विचार आएंगे । 
 3 
आज के दौर में
 दीमकों ने खाई तो , 
किताब मुस्कराई 
और बोली ...चलो ! किसी के तो काम आई ।
 4 
झूठ के नगर में 
किसी ने हमारे 
प्यारे 'सच' की बात चला दी 
सब चिल्लाए , " ऐसा कुछ नहीं होता है"
 मज़े की बात हमने भी हाँ में हाँ मिला दी।

 ************** 
डॉ ज्योत्स्ना शर्मा





Friday, 26 August 2022

179-सुनो ज़िंदगी !


 क्यूँ सोचते हो

जो तुम दर्द दोगे
तो बिखर जाऊँगी
ये जान लो
धुल के आँसुओं से
मैं निखर जाऊँगी ।

************

सुनो ज़िन्दगी !
तुम एक कविता
मैं बस गाती चली
रस -घट भी
प्रेम या पीडा़ -भरा
पाया , लुटाती चली ।

*************

ओ रे सावन !
प्यारा मीत सबका
कली का ,चमन का
श्यामल मेघ
संग में लाया कर
यूँ न भुलाया कर ।

*************

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 
(चित्र गूगल से साभार)

Sunday, 14 August 2022

178-देश रहे खुशहाल !



सभी देशवासियों को स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव पर ढेर सारी शुभकामनाएँ  !


खिलती फुलवारी कहे , सबके दिल का हाल ।
बारिश हो सद्भाव की , देश रहे खुशहाल ।।

****************************

बातें हों मुहब्बत की , बस प्यार की गंगा हो
हर कर में तिरंगा हो , हर घर पे तिरंगा हो ।।

****************************

जिसके ऐसे बलिदानी सुत उसकी मात नहीं होगी

बिखरी यश की अमर रश्मियाँ तय है रात नहीं होगी 

धरती से अम्बर तक गूँजे गाथाएँ बलिदानों की

बात तुम्हारी ही होगी बस तुमसे बात नहीं होगी !

*************************************

तुमको पथ से डिगा सके वो तीर यहाँ निष्काम हुआ 

छल से वार करे छुप-छुप कर वह वैरी बदनाम हुआ 

कोटि-कोटि नतमस्तक ,गूँजे 'अमर रहो' के जयकारे 

जिसमें तुमने जन्म लिया है वह घर तीरथधाम हुआ ।

***************************************

गर्व बहुत है तुम पर हमको दिल में पसरा गम भी है

अन्तिम दर्शन को व्याकुल हर नयन यहाँ पर नम भी है 

तुम-सा हो जाने की चाहत जाग रही है हर दिल में 

और तुम्हारी शौर्य कथा का फहराता परचम भी है 

***************************************

सिया राम जी की कहानी पे लिखना

कान्हा,कभी राधा रानी पे लिखना 

वतन की हिफाज़त में जो मर मिटी है 

कलम ! गीत ऐसी जवानी पे लिखना ।

**************************************


ज्योत्स्ना शर्मा





Friday, 5 August 2022

176- दो लोरियांँ


 लोरी - 1
मेरे राजदुलारे सो जाओ कल सूरज के संग उठ जाना
मेरी राजदुलारी सो जाओ कल किरणों के संग मुस्काना


तुम बनकर गीत सरस , सुन्दर
बस वचन मधुर कहते रहना
सबके मन में बन प्रीत अमर
रसधारा से बहते रहना
कलियाँ खिल जाएँ उमंगों  की
खुशियाँ ही खुशियाँ बरसाना । मेरे ....

तुम कृष्ण मेरे तुम राम मेरे
तुम राधा , मीरा , सीता हो
तुम भगत सिंह ,आज़ाद मेरे
तुम लछमी और सुनीता हो
राकेश, कल्पना के जैसे
अम्बर पर झन्डा फहराना । मेरे .....

लोरी -2 

आओ री निन्दिया रानी अंखियन में आओ
बिटिया को मेरी आकर सुलाओ
बिटवा को मेरे आकर सुलाओ

आओ तो संग ध्रुव, प्रह्लाद को लाओ
आओ तो गार्गी , अपाला को लाओ
ज्ञान का भक्ति का दीपक जलाओ ....

आओ कबीर सूर तुलसी को लाओ
आओ रसखान और मीरा को लाओ
सुन्दर कविता से मन को सजाओ....

आओ तो राणा प्रताप को लाओ
आओ तो पृथ्वी , छत्रसाल को लाओ
दुश्मन की छाती पे चढ़ना सिखाओ

आओ तो रानी लछमी को लाओ
आओ तो भगत सिंह ,आज़ाद को लाओ
माटी की खातिर मिटना सिखाओ

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 
(चित्र गूगल से साभार)







Tuesday, 24 May 2022

175- रेत के समन्दर


 

1
लिए बैठे हैं
प्यासे और बेचैन
रेत के समन्दर
कैसे तिरेगी
प्रेम की नाव वहाँ
रस ही नहीं जहाँ।


2
वक्त आएगा
जाग जाएँगे कभी
इस बस्ती के भाग
देखिए अभी
डसते विकास को
षडयंत्रों के नाग ।


3
कैसे रचती
मधुर-सी रचना
कचोटता यथार्थ
दिखता यहाँ
अक्सर ही बातों में
घुला-मिला है स्वार्थ ।

4
दूरदर्शन
कहता ही रहता
बस अपनी कथा
क्या बांच पाया
कभी यह किसी की
अपरिमेय व्यथा।

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 




Thursday, 12 May 2022

174-झूम- झूमकर नाचे गाए

 

कहमुकरियाँ : डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

1
कड़क ज़रा पर लगता मीठा
उजला-उजला चाँद सरीखा
पूजन , मंगल , सुख की आशा
क्या सखि साजन ,नहीं बताशा !
2
बड़े प्यार से देता पानी
हो गई उसकी बात पुरानी
पतली गरदन पेट है मोटा
क्या सखि साजन, ना सखि  लोटा !
3
जब भी लिपटे बहुत सुहाए
सारी सर्दी दूर भगाए
मुझको तो कायल कर डाला
क्या सखि साजन, नहीं दुशाला !
4
सब पर रौब उसी का छाया
जग में उसकी अद्भुत माया
सभी सँभालें उसको भैया
क्या सखि साजन, नहीं रुपैया !
5
ना चाहो पर मिल ही जाए
बच्चे हों या बूढ़ा पाए
सबक सिखाए सबको चोखा
क्या सखि शिक्षक, ना सखि धोखा !
6
जब से वह जीवन में आया
लगे धूप भी मुझको छाया
बरखा से भी मुझे बचाता
क्या सखि कमरा, ना सखि छाता !
7
जब भी पास हमारे आए
ज्ञान भरी बातें बतलाए
दुनिया भर का रखे हिसाब
क्या सखि साजन, नहीं किताब  !
8
जब भी दूर ज़रा हो जाए
मार सीटियाँ मुझे बुलाए
किसकी हिम्मत देखे छूकर
क्या सखि  साजन, ना सखि कूकर  !
9
मस्त हवा मस्ती में झूमे
झट मेरे गालों को चूमे
झुककर मेरी मूँदें पलकें
क्या सखि सजना , ना सखि अलकें।
10
कभी बताता पतली , मोटी
हूँ कितनी लम्बी या छोटी
बहस करूँ ना जाए जीता
क्या सखि साजन, ना सखि फीता !
11
देखा-देखी सीटी मारे
कभी राम का नाम उचारे
कितना खुशदिल कभी न रोता
क्या सखि साजन ?
ना सखि तोता ।
12
बने बड़ों का कभी सहारा 
उसने सब दुष्टों को मारा 
पतली, लम्बी है कद-काठी
क्या सखि साजन  ?
ना सखि  लाठी।
13
घन गरजें तो मस्ती छाए
झूम-झूमकर नाचे जाए 
खूब पुकारे करता शोर 
क्या सखि साजन ?
नहीं सखि मोर 
14
दिन भर ठहरे निपट अकेला
पास न रुपया, पैसा , धेला
उजली चादर देता बुनकर
क्या सखि साजन, ना सखि दिनकर।
15
जैसी , जिसकी ,रखता संगत
वैसी ही हो उसकी रंगत
करना चाहे बस मनमानी
क्या सखि साजन, ना सखि पानी।
16
दिनभर जाने कित छुप जाए
दिवस ढले झट मिलने आए
नैन मारकर करे इशारा
क्या सखि साजन, ना सखि तारा।
17
रोटी, सब्जी ,दाल बनाऊँ
सबसे पहले उसे जिमाऊँ
वो मन मोहे, लेउँ बलैया
क्या सखि साजन?
ना सखि गैया।
18
गीत बड़ी मस्ती में गाऊँ
संग मैं उसके उड़ती जाऊँ
वह पल मुझसे जाए न भूला
क्या सखि साजन?
ना सखि झूला।
19
करता पूरी पहरेदारी
वो मुझको मैं उसको प्यारी
नाटा, मोटा , है कुछ काला
क्या सखि साजन?
ना सखि ताला।
20
रहे अकड़कर शान निराली
मैं उसको देती हूँ ताली
सारे घर का है रखवाला
क्या सखि  साजन ?
ना सखि ताला।

- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 



















Friday, 6 May 2022

173- चँहु दिशि घूमे घाम


                     ( चित्र गूगल से साभार)


'गर्मी के दोहे' आपकी सेवा में - 


गाँव, शहर , खलिहान में , चँहु दिशि घूमे घाम ।

अलसाई दोपहर को , रुचे न कोई काम ।।1


रुत गरमी की आ गई, लिए अगन-सा रूप ।

भोर हुए भटकी फिरे, चटख सुनहरी धूप।।2


सूरज के तेवर कड़े, बरसाता है आग ।

पर मुस्काए गुलमोहर , पहन केसरी पाग ।।3


खूब रसीली लीचियाँ, बर्फ मलाईदार ।

खरबूजा , तरबूज हैं , गरमी के उपहार ।।4


लगें बताशा अम्बियाँ, बड़ी जायकेदार ।

भरी बाल्टियाँ ला धरीं , दादा जी ने द्वार ।।5


हरा पुदीना , मिर्च की , चटनी के क्या दाम ।

पना बना अनमोल है , खट्टे-मीठे आम ।।6


अम्मा ! घर में भर गई , महक मसालेदार ।

मुँह में पानी ला रहा , बरनी भरा अचार ।।7


बड़ी बेरहम ये गरम , हवा उड़ाती धूल 

मुरझाया यूँ ही झरा, विरही मन का फूल ।।8


तपता अम्बर , हो गई , धरती भी बेहाल ।

सूनी पगडंडी ,डगर , किसे सुनाएँ हाल ।।9


लथपथ देह किसान की , बहा स्वेद भरपूर ।

चटकी छाती खेत की , बादल कोसों दूर ।।10


दिनकर निकला काम पर , करे न कोई बात ।

कितने मुश्किल से कटी , यह गरमी की रात ।।11


उमड़-उमड़ कर जो कभी, खूब सींचती प्यार ।

सूख-सूख नाला हुई , वह नदिया की धार ।।12


ए.सी. , पंखा, फ्रिज थके , करते हैं फरियाद ।

घड़ा , सुराही , बीजणा, करो इन्हें भी याद ।।13


टी.वी.चैनल पर छिड़ी, बहस , बरसती आग।

कैसे हों ठंडे भला, भड़के गर्म दिमाग ।।14


सकल विश्व को ध्वंस के , मुख में रहे धकेल ।

विधि के नियत विधान में , मनुज करो मत खेल  ।।15


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

( प्रकाशित- 'शब्द सृष्टि' मई, 2022)

Sunday, 24 April 2022

172- अद्भुत कृति

 

                                 (चित्र गूगल से साभार)

प्रबुद्ध नारी 

समझे है जग को

न कहो 'ना री' !1

***********

खुलीआँखों से

देखतीं हैं सपने 

सच भी करें ।2

***********

रचा संसार

जन्मे हैं तुमने ही

राम, कृष्ण भी ।3

***********

जगदंबे तू

करुणा बरसाती

चण्डी भी तू ही।4

***********

नव कलिका

जीवन की सुगंध 

रंग है नारी ।5

***********

सुघड़ नारी 

खुशियों की कुन्जी है

अमोल रत्न ।6

***********

समेटे चली

छिन्न-भिन्न सपने 

आशा के मोती।7

***********

पंख कटे थे 

छूती आज अम्बर

भरे उड़ान।8

***********

जीवन दात्री 

पोरती है संस्कार 

दूध के संग ।9

***********

जीवन धात्री

प्रथम शिक्षिका है

सँवारे मन ।10

***********

सच्ची संगिनी

खुशियों के रंग से 

भरे जीवन ।11

***********

कहते माया 

दुनिया में उसका 

जादू है छाया ।12

***********

न मानी हार 

घुट-घुटके जीना 

नहीं स्वीकार ।13

***********

अद्भुत कृति 

पूजित, विमर्दित 

दूर्वा जैसी तू ।14

***********

तेरी कथायें 

अनगिन व्यथाएँ 

सदानीरा तू ।15

***********

भगिनी, सुता 

विविध रूप धरे 

धन्य ही करे ।16

***********

कोहरा घना

खोलती है खिड़की

एक किरण ।17

***********

गहन तम 

चन्द्रिका ही आकर 

बाँटे उजाला।18

***********

जीवन यात्रा 

बनती संजीवनी 

चिर संगिनी ।19

***********

स्वयं ईश्वरी 

साकार ममता है 

माँ रूप तेरा !20


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

Saturday, 12 February 2022

171- प्रेम

                                (चित्र गूगल से साभार)


1
प्रेम !
क्या है प्रेम ?
यह एक ....
दिव्य अनुभूति है ।
भावों की माला का
अनमोल मोती है ।
2
प्रेम बावरा !
महफिल में बेचैन , आहें भरता
छटपटाता है  ........
कभी तन्हाई में
खुद-ब-खुद मुस्कुराता है।
3
प्रेम ज़िंदगी है ,बन्दगी है
किसी को अलकें, पलकें
कंगन, बिंदिया , पायल है
कोई डूबा है इसमें ...
तो कोई प्रेम में घायल है ।
4
मिट जाता है कोई
तो कोई इसमें खोता है
यह मिलन ही नहीं
विरह में भी होता है।
सच में प्रेम ...अजर,अमर ,
अनंत रस का सोता है ।
5
वो कहते हैं
प्रेम फंदा  है, जाल है
नहीं ....
यह गहरा ताल है
जिसमें अश्कों के मोती मिलते हैं
इबादत के कँवल खिलते हैं।
6
प्रेम !
भूखे को भात है
दृष्टिहीन को .....
तारों भरी रात है।
छोकरा है ...छोकरी है
बेरोजगार को नौकरी है ।
शायर को गज़ल है ,
निर्धन को महल है
गहरे अँधेरे में सूर्य है, सविता है
और कवियों के लिए कविता है ।

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा






Sunday, 14 November 2021

170- बंदर की दुकान !

                                                                  बन्दर बैठा खोल दुकान  
लाया सब बढ़िया सामान 
कपड़े-लत्ते , पुस्तक, बरतन 
टॉफ़ी , केक , मिठाई 
देख-देख बिल्लू बिल्ले की 
तबियत कुछ ललचाई 
कैसे मुझको मिले मिठाई 
सोचे खूब लगाकर ध्यान 
बन्दर बैठा खोल दुकान 

बोला बिल्ला ज़रा मिठाई
चखकर देखूँ भैया 
बन्दर बोला चखने का भी 
होगा एक रुपैया 
पास नहीं धेला बिल्लू के 
टूट गए सारे अरमान 
बन्दर बैठा खोल दुकान 

भरी उदासी मन में ,बिल्लू 
लौटा मुँह लटकाकर 
बन्दर ने दी बालूशाही
तरस ज़रा सा खाकर 
बोला बिल्लू -भाईजान !
कल लाऊँगा मीठा पान !
तेरी बढ़िया बहुत दुकान !


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा  

                                                                    (चित्र गूगल से साभार)