Monday, 23 July 2018

134 - कैसे गाऊँ गीत सुहाना !





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डॅा. ज्योत्स्ना शर्मा

कैसे गाऊँ गीत सुहाना !

क्या सम्भव है ?
तृष्णा के तपते अधरों पर
तृप्ति का आकर मुस्काना !

अरे आग्रही  ! मत फँस इनमें
ये इच्छाएँ छद्म परी हैं
मधुरमदिर, मुस्कान नशीली
इन्द्रजाल की कनक-छरी हैं

युगों-युगों से सिखा रही हैं
तंत्र-मंत्र, पथ से भटकाना।

ऊहापोह की  नदिया ,माँझी
कण्ठ-कण्ठ तक डूब गया है।
हाय उजाला देते-देते
क्या सूरज भी  ऊब गया है

मावस की मन्थर गति चाहे
धवल चाँदनी का बिछ जाना ।

कैसे गाऊँ गीत सुहाना !
     -०-
( चित्र गूगल से साभार )


4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24-07-2018) को "अज्ञानी को ज्ञान नहीं" (चर्चा अंक-3042) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. इस प्रेरक उपस्थिति के लिए हृदय से आभार आदरणीय !

      सादर
      ज्योत्स्ना शर्मा

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  2. मन के तरल भाव को शब्द दे दिए हैं ..
    बहुत सुंदर रचना है ...

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    1. इस प्रेरक उपस्थिति के लिए हृदय से आभार आदरणीय !

      सादर
      ज्योत्स्ना शर्मा

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