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Monday, 8 June 2015

निखरी धूप




डॉ•भावना कुँअर को पढ़ना मेरे लिए हमेशा रोमांचक, आत्मीय भाव जगाने वाला और रससिक्त करने वाला रहा है। सद्य प्रकाशित सेदोका- संग्रह ‘ जाग उठी चुभन’ पढ़ा  तो कुछ भाव उमड़ पड़े।हाइगा और हाइकु के रूप में प्रस्तुत हैं-
डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
बिखरी धूप
चेहरा चूमकर
निखरी धूप।
2
व्याकुल चाँद
ढूँढ रहा चाँदनी,
यहाँ छुपी थी !
3
क़ैद तुम्हारे
इन दोनों नैनों में,
सूरज , चाँद ।
4
हुई  मुखर
फिर गीतों की गंगा
बहे  निर्झर ।
-0-