Sunday, 14 June 2015

महफिलें याद की !


 
 डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा                                                                                                  


1
पुरवा में पन्ने उड़े , पलटी याद किताब ।
कितना मन महका गया , सूखा एक गुलाब ।। ..
2

दर्द,महफिलें याद कीं , खुशियों के  अरमान ।

मुट्ठी भर औकात है , पर कितना सामान ।।

3

सहने को सह जाएँगे , पत्थर बार हज़ार ।
बहुत कठिन सहना हमें , कटुक वचन के वार ।।

4


माथे का चन्दन हुई , उसके पग की धूल ।


मनुज मनुजता हित बढ़ा , केवल निज सुख भूल ।।

5

बीती बातें भूल कर , चलो मिला लें हाथ ।

जीवन भर क्या कीजिए ,नफ़रत लेकर साथ ।।

6

रिश्ते कल पूछा किए ,हमसे एक सवाल ।

खुद ही सोचो बैठ कर , क्यों है ऐसा हाल ।।
 


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(चित्र गूगल से साभार )

Thursday, 11 June 2015

सृष्टि-सृजन




निवेदन !
 राजस्थान में जन्मी ,पली-बढीं ,हिन्दी एवं इतिहास में स्नातकोत्तर स्तरतक शिक्षा प्राप्त सुश्री अनिता मंडा अपने सुरुचि पूर्ण लेखन से साहित्य-साधना में संलग्न हैं।आज उनकी एक ऐसी ही रचना प्रस्तुत है।आशा करती हूँ आपका स्नेह-आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करेगी |
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा



सृष्टि-सृजन

    -अनिता मंडा 

एक ख़ामोशी की
नदी जमकर
बन गई हिम शिखर
तुम्हारे भीतर
एक आँच
सुलगा रही है
मुझे भी सदियों से
इस आँच को छुपाए
बनते हुए राख
क्षण-प्रतिक्षण
तड़प- झुलस
नहीं बुझने दी आँच।
इसी प्रतीक्षा में
कि एक दिन
ये आँच
पिघला देगी हिमशिखर
मुक्त्त हो जाओगे तुम
हृदय -भार से।
पर यह आभास रहे
हिमशिखर आँच के
इतना ही पास रहे
बहे नदी बनकर
सैलाब बनकर नहीं।
सृष्टि-सृजन हो बाधित
यह मुझे स्वीकार नहीं।
खिले सृष्टि
खिले वसन्त
नदी- नीर लेकर
खिले धरा।
एक टहनी जिस पर
खिले हैं स्मृति -पुष्प
आओ हिलाएँ मिलकर
चुन लें फूल
आधे तुम्हारे
आधे मेरे।
धरती पर पाँव जमाएँ
छुएँ आसमाँ के तारे
पा लें पूर्णता
उस समग्र का अंश
अनुभूत हमें
करें निर्मित संतुलन
प्रकृति के साथ।



-0-
 (चित्र गूगल से साभार )

Monday, 8 June 2015

निखरी धूप




डॉ•भावना कुँअर को पढ़ना मेरे लिए हमेशा रोमांचक, आत्मीय भाव जगाने वाला और रससिक्त करने वाला रहा है। सद्य प्रकाशित सेदोका- संग्रह ‘ जाग उठी चुभन’ पढ़ा  तो कुछ भाव उमड़ पड़े।हाइगा और हाइकु के रूप में प्रस्तुत हैं-
डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
बिखरी धूप
चेहरा चूमकर
निखरी धूप।
2
व्याकुल चाँद
ढूँढ रहा चाँदनी,
यहाँ छुपी थी !
3
क़ैद तुम्हारे
इन दोनों नैनों में,
सूरज , चाँद ।
4
हुई  मुखर
फिर गीतों की गंगा
बहे  निर्झर ।
-0-

Wednesday, 3 June 2015

जीवन खेला राम का !



डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
 जीवन खेला राम का ,रंगमंच संसार
और निभाने हैं हमें , अलग-अलग किरदार
अलग-अलग किरदार ,खेल है मन से खेलो 
पल-पल बदलो रूप , मिले जो सुख-दुख झेलो
मृग-मरीचिका हन्त ! रहेगा प्यासा ही मन 
कर अभिनय जीवन्त ,मात्र खेला है जीवन ।।
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चित्र गूगल से साभार