Thursday, 27 February 2014

दो रचनाएँ .....

एक 

आवाजाही जारी है
 ,
फिर हंगामा तारी है 

जाने कैसा रोग लगा ,
जाने क्या बीमारी है 


नस -नस में घोटाला है ,
रग-रग में मक्कारी है 


क्या जाना क्या अनजाना
 ,
पंजे में ऐयारी है
 


अंधे को अंधा कहते
 ,

अब तो विपदा भारी है 

बुझे दिए में  तेल भरो
 ,
इसमें क्या  हुशियारी है 

काल कलम से पूछ रहा
 ,
तेरी किससे यारी है 

दो 

जब से वो मशहूर हुए ,
थोड़ा -सा मग़रूर हुए ।

आसमान से की बातें ,
धरती से दूर हुए ।

जाम मिला जब सत्ता का ,
खूब नशे में चूर हुए ।

गैरों को अपनाते क्या ,
अपनों से भी दूर हुए ।

चुप रहना था, बोल उठे ,
आदत से मजबूर  हुए ।

नूरे इलाही छोड़ गया ,
यूँ आखिर बेनूर हुए ।
-0-

डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

Tuesday, 28 January 2014

सवेरा !!

                                   चित्र गूगल से साभार 
डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 


फैली है हरसूँ ........ये कैसी चादर ,
देखें चलो हम.....भी परदा हटाकर |

इतना गणित हमको समझा दो रख दें ,
खुशी जोड़कर और गमों को घटाकर |

ले चल मुझे उसकी जानिब,कि जिस तक ,
झाँका न अब तक....सवेरा भी जाकर |

बरसीं जो बूँदें .......तब दिल ने जाना ,
रोया बहुत........वो भी मुझको रुलाकर |

खुद पर ही....जिनको भरोसा नहीं वो ,
क्यों देखते हैं............मुझे आज़माकर |

इस दिल की बस्ती में रौशन सा कुछ है ,
ज़रा देख लेना.........निगाहें झुकाकर |

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Sunday, 26 January 2014

शुभ गणतंत्र दिवस !!

                                    चित्र गूगल से साभार


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

दें ऐसा मंत्र मुझे 
महका , मर्यादित सा 
रचना गणतंत्र मुझे !

लिख गीत जवानों के 
जिनके दम से हैं 
मौसम मुस्कानों के !

मैं रोज़ दुआएँ दूँ 
'खूब बहार खिले'-
दिन-रैन सदाएँ दूँ !

तेरा ना मेरा हो 
अपने भारत में 
खुशियों का डेरा हो !

हार्दिक शुभकामनाएँ !!

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Wednesday, 15 January 2014

तुम दर्द नहीं हो ...

                                 चित्र गूगल से साभार 

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 


मधुर-मधुर ये गाया करती ,
सुन्दर छंद सुनाया करती ।

तुम कान्हा हो तो मधुबन में ,
रसमय रास रचाया करती ।

शिवमय होकर पतित-पावनी ,
गंगा -सी बह जाया करती ।

राम ,रमा-पति कण्ठ लगाते ,
मुग्धा बहुत लजाया करती ।

चाहत थी जो तुम छू लेते ,
कलियों- सी महकाया करती ।

तुम बिन गीत-ग़ज़ल में कैसे ,
इतना रस बरसाया करती ।

अच्छा है ! तुम दर्द नहीं हो ,
वरना कलम रुलाया करती ।

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Tuesday, 31 December 2013

स्वागत ..नवागत !!




डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 


नवागत
स्वागत करूँ
तुम्हारा अभिनन्दन !
अक्षत आशा ,विश्वासों का
ले कुमकुम चन्दन
रहें सुवासित पवन
जल निर्मल ,
हो निष्कंप धरा
कभी न उमड़े सागर
मन में पीर भरा
याचित यही
मुरझाये मन और नयन को
दे मोती सी आभ 
रहें न वंचित
नन्हे कर को
देना कलम-किताब
कर स्वीकार ,समय-नंदन !!!

सब प्रकार से स्वस्थ ,सुन्दर ,मंगलमय नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाओं के साथ ........
ज्योत्स्ना शर्मा 


Monday, 16 December 2013

श्रद्धांजलि ...निर्भया !

                             

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

1
देकर ...
किरणों से ...
थोडा  सा तेज ..
थोड़ा सा  रूप ..
बना दो न दिनकर ..
मुझ को भी ....धूप ..

2
दीप्त दामिनी सी रह - रह कर अपना भान  कराती जाना ,
मधुर कण्ठ से मृदुल सुकोमल स्वरमय तान सुनाती जाना |
अस्तित्व मिटे न भीड़ भरे... इन चौराहों पर कहीं तुम्हारा ;
नारी बन अंगार अलग स्वयं की पहचान बनाती जाना ......

-0- सत्यं , शिवम् ,सुन्दरम् के सृजन के लिए ..और ..अमंगल के दहन के लिए यह अग्नि सदैव जीवित ..जाग्रत रहे ऐसी कामना के साथ ...
...सजल नयन ...श्रद्धांजलि ...निर्भया !

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 ( चित्र गूगल से साभार )


Friday, 13 December 2013

तोलो फिर कुछ बोलो ।

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1
कवि ऐसे मत डोलो
अर्थ अनर्थ करे
तोलो फिर कुछ बोलो ।
2
क्या बात लगी करने
बादल से धरती
फिर पीर लगी झरने ।
3
देंगें तो क्या देंगें
ग़म के शोलों को
वो सिर्फ हवा देंगें ।
4
अब यूँ न विचर तितली
धूप यहाँ ...दिन में !
कल डर-डर कर निकली ।
5
ऐसे न किरन हारी
जीत गई तम से
सूरज था सरकारी ।
6
उफ़ !आज हुआ बेकल
सुन-सुन के सागर
ये नदिया की कल-कल ।

-0-