Thursday, 16 April 2015

रस-निर्झर !



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

ताँका

1
बुहार दिए
निराशा के पत्रक
जा पतझर !
सुधियों की वीणा है
पाया रस निर्झर !

2
तुम सूरज !
मैं रससिक्त धरा
खूब तपा लो,
मेरे मन यादों का
गुलमोहर झरा !

3
अरी पवन !
ली खुशबू उधार 
कली-फूल से 
ज़रा कर तो प्यार 
न कर ऐसे वार !

4
बीज खुशी के 
मैं बो आई थी कल 
उग आएँगे
कुछ पौधे प्यारे-से 
प्रेम-रस-भीने से !

~~~~****~~~~

3 comments:

  1. बहुत भावपूर्ण और सुंदर ताँका

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  2. बहुत भावपूर्ण और सुंदर ताँका

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