निवेदन !
राजस्थान में
जन्मी ,पली-बढीं ,हिन्दी एवं इतिहास
में स्नातकोत्तर स्तरतक शिक्षा प्राप्त सुश्री अनिता मंडा
अपने सुरुचि पूर्ण लेखन से साहित्य-साधना में संलग्न हैं।आज उनकी एक ऐसी ही रचना
प्रस्तुत है।आशा करती हूँ आपका स्नेह-आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करेगी |
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा
सृष्टि-सृजन
एक ख़ामोशी की
नदी
जमकर
बन
गई हिम शिखर
तुम्हारे
भीतर
एक
आँच
सुलगा
रही है
मुझे
भी सदियों से
इस
आँच को छुपाए
बनते
हुए राख
क्षण-प्रतिक्षण
तड़प-
झुलस
नहीं
बुझने दी आँच।
इसी
प्रतीक्षा में
कि
एक दिन
ये
आँच
पिघला
देगी हिमशिखर
मुक्त्त
हो जाओगे तुम
हृदय
-भार से।
पर यह आभास रहे
हिमशिखर
आँच के
इतना
ही पास रहे
बहे
नदी बनकर
सैलाब
बनकर नहीं।
सृष्टि-सृजन
हो बाधित
यह
मुझे स्वीकार नहीं।
खिले
सृष्टि
खिले
वसन्त
नदी-
नीर लेकर
खिले
धरा।
एक
टहनी जिस पर
खिले
हैं स्मृति -पुष्प
आओ
हिलाएँ मिलकर
चुन
लें फूल
आधे
तुम्हारे
आधे
मेरे।
धरती
पर पाँव जमाएँ
छुएँ
आसमाँ के तारे
पा लें पूर्णता
उस
समग्र का अंश
अनुभूत
हमें
करें
निर्मित संतुलन
प्रकृति के साथ।
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