Friday, 8 April 2016

शुभ कामनाएँ !



नव संवत्सर, गुडी पाडवा ,चेटी चण्ड एवं उगादी पर्व की हार्दिक शुभ कामनाएँ !
-डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा  
मेरे घर से आप का , यूँ तो घर है दूर 
मगर दुआ के पेड़ हैं, छाया ,फल भरपूर 

माँ मंजूषा स्नेह की , माँ ममता की खान 
संचित शत सद्कर्म से ,मिले भक्ति वरदान 

जन्मा,पाला,दंड दे, दिया सुघड़ मन, वेश 
माँ तुझमें तीनों बसे ,ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश 

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                    (चित्र गूगल से साभार )

Tuesday, 22 March 2016

ये फागुन के रंग !



होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ !
             -डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

प्रगटे मनु तिथि पूर्णिमा ,उत्सव हुआ अपार 
जगती के प्रारम्भ का ,वासंती त्योहार ।।1

कहाँ क्रूर अति पूतना ,कहाँ सुकोमल श्याम 
अद्भुत लीला आपकी ,हर्षित गोकुल धाम ।।2

इत हाथों में लाठियाँ ,उत है लाल गुलाल 
बरसाने की गोपियाँ ,नन्द गाँव के ग्वाल ।।3

दहे होलिका वैर की ,खिले प्रेम प्रह्लाद 
सदय दृष्टि प्रभु की रहे ,बरसे बस आह्लाद ।।4

बड़ा दही-कर छोड़कर ,कांजी संग मुस्काय 
रसगुल्ले का ले गई ,गुँझिया हृदय चुराय ।।5

बस भल्लों की भूख है,ठंडाई की प्यास ।
घुमा फिरा कर मन बसे,गुझिया की ही आस ।।6

शक्करपारे चट हुए ,कम लगते पकवान ।
बना-बना कर हो गई ,माँ कितनी हैरान ।।7

दरवाज़े की ओट में ,टिकुआ खड़ा उदास ।
जाए ख़ाली हाथ क्या , अब बच्चों के पास ।।8

देख सयानी बेटियाँ ,किसका रंग गुलाल  
कैसे पीले हाथ हों ,सोचे दीन दयाल ।।9

नथनी , कंगन बेचकर , ले आया सामान ।
रमुआ के मन में बसी ,बिटिया की मुस्कान ।।10

सिंधारे में भेज दूँ , साड़ी संग गुलाल ।
बिटिया का सुख सोच कर ,मैया हुई निहाल ।।11

सीधे-साधे की हुई , आड़ी-तिरछी चाल । 
होली तेरे रंग ने , कैसा किया कमाल ।।12

भेदभाव सब मिट गए , खोई है पहचान ।
रंग लगाएँ शौक़ से , ज़रा लगाकर ध्यान ।।13 

एक वेश-परिवेश सब ,रंग-उमंगों डूब 
गले मिलन रसिया चले ,हुई धुलाई खूब ।।14

देखभाल कर कीजिए,रंगों का उपयोग ।
सुघढ़ ,सलोनी देह को,लगे न कोई रोग ।।15

धानी-पीली ओढ़नी ओढ़ धरा मुस्काय ।
रंग बिखेर कर ,सूरज भागा जाय ।।16

बौराया मौसम हुआ , पवन करे हुड़दंग ।
पागल मनवा माँगता,सदा तुम्हारा संग ।।17

बहे पवन सद्भाव की , चढ़े प्रेम की भंग  
खुशियों की वर्षा करें ,ये फागुन के रंग ।।18

तन-मन सारे रँग गए ,खूब चढ़ा ली भंग 
कैसे भूलूँ भारती ,मैं केसरिया रंग ।। 19

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(चित्र गूगल से साभार )

Monday, 7 March 2016

महकी कस्तूरी !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

बिटिया आँगन की कलीउपवन का शृंगार |
महकी कस्तूरी हुई, महकाए संसार  ||

छू लेना आकाश मन ,रख मिट्टी का मान | 
तुम्हें धरा पर स्वर्ग का, करना है संधान ||

कहीं धूप अंगार सी, कहीं मिलेगी छाँव |
काँटे भी है राह में , सखी ! सँभल रख पाँव ........

.बहुत शुभ कामनाएँ !!

(चित्र गूगल से साभार )



Wednesday, 6 January 2016

नम नयनों से नमन करूँ माँ ऐसे राजदुलारों को ...



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

दंड अभी देना है पक्का ,सरहद के हत्यारों को
उससे पहले ढूँढो ,ठोको ,भीतर के ग़द्दारों को 
दुश्मन के सब वार भारती झेल तिरंगा ओढ़ लिया
नम नयनों से नमन करूँ माँ ऐसे राजदुलारों को ...

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दीप कभी क्या गर्वित हो सूरज से आँख लड़ाता है
उद्दण्ड पवन के झोंकों से क्या पर्वत झुक जाता है 
सवा अरब हतभागी कब तक किस किस से अपमान सहें 
चुल्लू भर पानी सागर की लहरों को धमकाता है ....


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(चित्र गूगल से साभार ) 

Monday, 28 December 2015

पैगामे दिसम्बर !




यूँ तो हरेक साल ही आता है दिसम्बर 
लेकिन नए सबक़ भी सिखाता है दिसम्बर ।

चम्पई सी धूप तो कोहरे की शॉल में
अपने बदन को कैसे छिपाता है दिसम्बर ।

गौरव कथा सुनाती है 'सोलह' जो साथियों 
तो दर्द में किसी के रुलाता है दिसम्बर ।

रिश्तों की ओढ़नी पे बिछी बर्फ़ ही मिली
विरहन को मगर आग लगाता है दिसम्बर ।

गर्माहटों से प्रेम की भर जाए जनवरी(ज़िंदगी)
देके दुआ दिल से ये,  जाता है दिसम्बर ।


नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ......

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

(चित्र गूगल से साभार)

Wednesday, 23 September 2015

दो कविताएँ !



अनिता मंडा


रूह
१ 
आग इसे जला नहीं सकती
पानी गला नहीं सकता
हवा इसे सुखा नहीं सकती
पर सदा छुअन से परे
कब रह पाती है रूह
दबती तो है यादों के बोझ से
काँपती तो है काली
अँधेरी परछाइयों से
तोड़ते तो हैं दुःख के
पत्थर इसे
बंधती तो है
मोह के धागों से
कहाँ रह पाती है
रूह आज़ाद।

 २ 

सज़दे में है या गुनाह में है
दिल तू ही बता किस राह में है...

फिर एक छनाका होने को है
शीशा पत्थर की पनाह में है...

अब रूह काँपती है इस चमन की
कली इक खिलने की चाह में है...

यूँ खेला न करो टूटे दिल से
कुछ तो असर उसकी आह में है...

हमसे सच कह दिया करो हुजूर
कुछ ना रखा झूठी सी वाह में है...

छुपा ना रहेगा कुछ भी उससे
अब हर कदम उसकी निगाह में है...

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(चित्र गूगल से साभार)