धरती की चूनर .....डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
कुपित रवि
किरणें करें वार
सहमी धरा |१
कराहें कभी
वन ,वृक्ष ,कलियाँ
रोती है धरा |२
बादल धुआँ
घुटती सी साँसें हैं
व्याकुल धरा |३
न घोलो विष
जल ,जीव व्याकुल
है प्यासी धरा |४
व्यथा कथाएँ
धरा जब सुनाए
सिन्धु उन्मन |५
नाचेगा मोर ?
बचा ही न जंगल
कैसी ये भोर ?६
अक्षत रहे
धरती की चूनर
ओजोन पर्त |७
अतिवृष्टियाँ
खुद भेंट अपनी
अनावृष्टियाँ|८
गूँजीं थीं कभी
वो पावन ऋचाएँ
गुनगुनाएँ |९
संभल जाएँ
मधुमय बनाएँ
धरा सजाएँ |१०




