Sunday, 9 June 2013

परबत की पीर बहे


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 
1
सोने -सी निखर गई 
नाम लिया तेरा 
सिमटी ,फिर बिखर गई 
2
है दिल की लाचारी 
मत खोलो साथी 
यादों की अलमारी 
3
वो लाख दुहाई दें 
बस में ना उनको 
अब याद रिहाई दें 
4
अँखियाँ कितनी तरसीं !
यादों की बदली 
फिर उमड़ -उमड़ बरसी 
5
बादल तो काले थे 
यादों के तेरी 
बस साथ उजाले थे 
6
हौले से हाय छुआ !
तेरी याद किरण 
मन मेरा कमल हुआ 
7
जग दरिया लाख कहे 
जान गई मैं तो 
परबत की पीर बहे 
8
पीले -से पात झरे 
अनचाहे ,दिल के 
होते हैं जख्म हरे 
-0-

Wednesday, 5 June 2013

पर्यावरण दिवस पर ....

धरती की चूनर .....डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 



कुपित रवि
किरणें करें वार
सहमी धरा |१

कराहें कभी
वन ,वृक्ष ,कलियाँ
रोती है धरा |२

बादल धुआँ
घुटती सी साँसें हैं
व्याकुल धरा |३

न घोलो विष
जल ,जीव व्याकुल
है प्यासी धरा |४

व्यथा कथाएँ
धरा जब सुनाए
सिन्धु उन्मन |५

नाचेगा मोर ?
बचा ही न जंगल
कैसी ये भोर ?६

अक्षत रहे
धरती की चूनर
ओजोन पर्त |७

अतिवृष्टियाँ
खुद भेंट अपनी
अनावृष्टियाँ|८

गूँजीं थीं कभी
वो पावन ऋचाएँ
गुनगुनाएँ |९

संभल जाएँ
मधुमय बनाएँ
धरा सजाएँ |१०

Friday, 24 May 2013

उड़कर नहीं देखा ...


डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 

बीती हुई बातों से बिछुड़कर नहीं देखा ,
क्यूँ पास में थे पंख फिर उड़कर नहीं देखा |

वो प्यास से तड़पा बहुत शहरी गुरूर में ,
था गाँव में पनघट मगर मुड़कर नहीं देखा |

कुछ भी कठिन नहीं था ,रही इक भूल हमारी ,
बस एक ने भी एक से जुड़कर नहीं देखा |

बेपर्दगी गुरबत का दर्द झेलना पड़ा ,
जब पाँव ने चादर में सिकुड़कर नहीं देखा |

ये नफरतों की आग बुझे भी तो किस तरह ,
आँखों के समंदर ने निचुड़कर नहीं देखा ||


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Sunday, 21 April 2013

बनो न चिड़िया






डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

कहीं अकेली कभी न जाना
ये दुनिया बहुत सताती है ,
तनहाई में अक्सर बिटिया
गुड़िया को यह समझाती है |

दिखे समाधि गाँधी जी की
छू आने की जिद मत करना ,
आज़ादी का जश्न देखने
अब जाने की जिद मत करना
कल तक थी जो दिल वालों की
अब तो बस दिल दहलाती है |

तनहाई में अक्सर बिटिया
गुड़िया को यह समझाती है |

बचकर भला किधर जाओगी
डर जाओगी ,मर जाओगी
याद रहे ये बात किसी से
कुछ न कभी लेकर खाओगी
बनो न चिड़िया, बनो शेरनी
ये कह कर दिल बहलाती है

तनहाई में अक्सर बिटिया
गुड़िया को यह समझाती है
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20-04-13

Thursday, 11 April 2013

कहाँ विश्राम लिखा !( नव संवत्सर पर विशेष)


डॉ•ज्योत्स्ना  शर्मा
सुन सखी ! कहाँ विश्राम लिखा !
मैंने तो आठों याम लिखा ।
पथ पर कंटक,  चलना होगा,
अँधियारों में जलना होगा ।
मन- मरुभूमि सरसाने को 
हिमखंडों- सा, गलना होगा ।
शुभ, नव संवत्सर हो सदैव ,
संकल्प यही सत्काम लिखा।।
केवल जीने की चाह नहीं ,
भरनी मुझको अब आह नहीं ।
फूल और कलियाँ मुस्काएँ
गूँजे न कोई कराह कहीं ।
नव आगत तेरे स्वागत में 
पल का प्यारा पैगाम लिखा ।।
समय मिलेगा फिर बाँचेगा
मेरी भी कापी जाँचेगा।
रहे हैं कितने प्रश्न अधूरे ;
कितने उत्तर सही हैं पूरे ।
जीवन के खाली पन्नों पर -
साँसों का बस संग्राम लिखा ।।
मैंने तो आठों याम लिखा ,
सुन सखी ! कहाँ विश्राम लिखा !
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