चन्दन वन सा मन हुआ ,महके है दिन रैन,
तृष्णा की विष वल्लरी , कब लेने दें चैन |
कब लेने दें चैन , लगे फल आह व्यथा के ,
शेष नहीं हैं बैन ,सुवासित सरस कथा के |
मातु करो उपकार , प्रभासित कर कंचन सा ,
हो अति मधुर उदार ,चारु चित चन्दन वन सा ||1
कलियाँ ख़ुशियों की खिलीं ,ज्यों आए हों कन्त,
धरा मगन,द्वारे खड़े ,हैं ऋतुराज वसन्त |
हैं ऋतुराज वसन्त ,पीत परिधान सुहावन,
सुरभित मंद झकोर ,मधुर गुंजन मनभावन |
बौराई रुत ,आम्र, झूम उठते घर-गलियाँ ,
मिटे सकल संताप, न कैसे खिलतीं कलियाँ ||2
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