Monday, 1 June 2015

गर्मी के तेवर !!!!


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
1
दिन  ने खोले नयन जब ,बड़ा विकट था हाल ,
पवन,पुष्प ,तरु ,ताल ,भू ,सबके सब बेहाल।

सबके सब बेहाल ,कुपित कुछ लगते ज़्यादा  ,
ले आँखों अंगार , खड़े थे सूरज दादा।

घोल रहा विष कौन .गरज कर तब वह बोले ,
लज्जित मन हैं मौन , नयन जब दिन  ने खोले।।१  
2
गर्मी के तेवर बढ़े ,और बिजुरिया  गोल , 
शरबत , लस्सी  ,छाछ पर , चल अब हल्ला  बोल।

चल अब हल्ला बोल , आम सा फल नहीं दूजा  ,
भाया है तरबूज , और मीठा खरबूजा।

नींबू , पना , सलाद , भरे तबियत में नर्मी  ,
वश में हों हालात  , शांत हो थोड़ी गर्मी ।।२ 
 -0-
(चित्र गूगल से साभार )

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Wednesday, 27 May 2015

जय माँ गंगे !


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा


गौमुख से गंगा चली , बह सागर की ओर ,

देख रही माँ भारती ,होकर भाव –विभोर |

होकर भाव- विभोर  , हुई हर्षित  भू पावन , 

नित-नित संध्या भोर , सुहावन तट मन-भावन |

जिसका केवल ध्यान  ,भरे जीवन को सुख से ,

कर तन-मन अम्लान , चली गंगा गौमुख से ||
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चित्र गूगल से साभार


Monday, 20 April 2015

वो पहले का गाँव !


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 


झूले,गीत ,बहार सब ,आम,नीम की छाँव |
हमसे सपनों में मिला ,वो पहले का गाँव ||

सूरज की पहली किरन ,पनघट उठता बोल |
छेड़ें बतियाँ रात की , सखियाँ करें किलोल ||

गगरी कंगन से कहे ,अपने मन की बात |
रीती ही रस के बिना ,बीत जाए रात ||

अमराई बौरा गई , बहकी बहे बयार |
सरसों फूली सी फिरे ,ज्यों नखरीली नार ||

कच्ची माटी ,लीपना ,तुलसी वन्दनवार |
सौंधी-सौंधी गंध से ,महक उठे घर-द्वार ||

बेला भई विदाई की ,घर-घर हुआ उदास |
बिटिया पी के घर चली ,मन में लिए उजास ||

सोहर बन्ने गूँजते ,आल्हा ,होली गीत |
बजे चंग मस्ती भरे ,कण-कण में संगीत ||

संध्या दीप जला गई ,नभ भी हुआ विभोर |
उमग चली गौ वत्सला ,अपने घर की ओर ||

बहकी-बहकी सी पवन ,महकी-महकी रात |
नैनन-नैन निहारते ,तनिक हुई ना बात ||

नींद खुली ,अँखियाँ हुईं ,रोने को मजबूर |
लेकर थैली ,लाठियाँ ,गाँव नशे में चूर ||१०

जात-धर्म के नाम पर ,बिखरा सकल समाज |
एक खेत की मेंड़ पर , चलें गोलियां आज ||११

कैसे मैं धीरज धरूँ ,दिखे कोई रीत |
कैसे पाऊँगी वही ,सावन ,फागुन , गीत ||१२

दिए दिलासा दे रहे ,रख मन में विश्वास |
हला! हिम्मत हारिए ,जलें भोर की आस ||१३

तम की कारा से निकल ,किरण बनेगी धूप |
महकेगी पुष्पित धरा ,दमकेगा फिर रूप ||१४

चित्र गूगल से साभार 

Thursday, 16 April 2015

रस-निर्झर !



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

ताँका

1
बुहार दिए
निराशा के पत्रक
जा पतझर !
सुधियों की वीणा है
पाया रस निर्झर !

2
तुम सूरज !
मैं रससिक्त धरा
खूब तपा लो,
मेरे मन यादों का
गुलमोहर झरा !

3
अरी पवन !
ली खुशबू उधार 
कली-फूल से 
ज़रा कर तो प्यार 
न कर ऐसे वार !

4
बीज खुशी के 
मैं बो आई थी कल 
उग आएँगे
कुछ पौधे प्यारे-से 
प्रेम-रस-भीने से !

~~~~****~~~~

Thursday, 26 March 2015

एक ग़ज़ल !



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

खुद को खुद समझाया कर ,
केवल दर्द न गाया कर |
सच्चाई....औ’....खुद्दारी ,
इन पर वक्त न जाया कर |
दुनिया का दस्तूर यही ,
खाया और खिलाया कर |
अपने भी कुछ फ़र्ज़ यहाँ ,
यह मत याद दिलाया कर |
बस आईना ले दिल का ,

खुद को रोज़ दिखाया कर |५.
       - 'गुलशने-ग़ज़ल' से 

डॉ. मिथिलेशकुमारी मिश्र जी के सम्पादन में महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों का संकलन 'गुलशने-ग़ज़ल' वाणी -वाटिका प्रकाशन ,सैदपुर , पटना ,बिहार से प्रकाशित हुआ है | जिसमें उन्होंने वरिष्ठ महिला रचनाकारों के साथ मेरी भी 27 रचनाओं को स्थान देकर मेरा बहुत उत्साहवर्धन किया है | इस प्रोत्साहन के लिए आदरणीया डॉ. साहिबा की हृदय से आभारी हूँ | 

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

  


Monday, 23 March 2015

कमल !


1- डॉ ज्योत्स्ना शर्मा 1 नील कमल ! शांत झील ने गाई मीठी ग़ज़ल । 2 ओस नहाए कमल गुलाबी ,या प्रभु मुस्काए । 3 धरा सजी है, नीली चुनरिया पे श्वेत कमल । 4 जागी थी झील कमल नयन ये हुए हैं लाल । 5 खिले कमल ...
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