Sunday, 12 August 2018

135-चलो री सखी झूलन चलें !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा


कहीं सजे होंगे मेले , झूल
चलो री सखी फिर से मिलें
चलो री सखी झूलन चलें  ...

तुम तो बस गईं संगम-तीरे,
मैं गुजराती नार
मस्त बरेली ,याद दिलाऊँ,
वो पहले का प्यार …
कहीं हमको न जाना तुम भूल , चलो ......

दिल्ली,मुंबई,संगरूर में,
कोई अहमदाबाद
दिल से दिल के आज जुड़े हैं
तार गाजियाबाद…
देखो यादों के महके फूल, चलो ..........

सूरत और बड़ौदा यूँ तो ,
नहीं ज़रा भी दूर
फिर भी जाने बात हुई क्या
मिलने से मज़बूर ..
हसरत पर चढ़ गई धूल , चलो .......

मैया ने गुंझिया भिजवाईं
और भैया ने साड़ी
बालकनी में  खड़ी अकेली
देखूँ हारी-हारी…
मेरे मनवा में चुभ रहे शूल चलो .....

             -०-

Monday, 23 July 2018

134 - कैसे गाऊँ गीत सुहाना !





-
डॅा. ज्योत्स्ना शर्मा

कैसे गाऊँ गीत सुहाना !

क्या सम्भव है ?
तृष्णा के तपते अधरों पर
तृप्ति का आकर मुस्काना !

अरे आग्रही  ! मत फँस इनमें
ये इच्छाएँ छद्म परी हैं
मधुरमदिर, मुस्कान नशीली
इन्द्रजाल की कनक-छरी हैं

युगों-युगों से सिखा रही हैं
तंत्र-मंत्र, पथ से भटकाना।

ऊहापोह की  नदिया ,माँझी
कण्ठ-कण्ठ तक डूब गया है।
हाय उजाला देते-देते
क्या सूरज भी  ऊब गया है

मावस की मन्थर गति चाहे
धवल चाँदनी का बिछ जाना ।

कैसे गाऊँ गीत सुहाना !
     -०-
( चित्र गूगल से साभार )


Friday, 13 July 2018

133 - ये लफ्ज़ नहीं सफ़र के छाले हैं !



 डॉ•ज्योत्स्ना शर्मा


सफ़र के छाले हैं( हाइबन-हाइकु-संग्रह) : डॉ•सुधा गुप्तापृष्ठ:112 ; मूल्य :220 रुपये।संस्करण: 2014 ; प्रकाशक: अयन प्रकाशन , 1/20, महरौली नई दिल्ली-110030

            हाइकु ,ताँका ,सेदोका और चोका के बाद जापानी साहित्य की एक और लोकप्रिय विधा ‘हाइबन’से परिचय हुआ। कुछ हाइबन पढ़े तो और अधिक जानने की जिज्ञासा हुई । तभी डॉ. सुधा गुप्ता जी का  हाइबन और हाइकु का संग्रह ‘सफर के छाले है’ पढ़ने का सुयोग बना ; जिसे पढ़कर हाइबन के भावगत-शिल्पगत सौंदर्य ने और भी अभिभूत कर दिया ।अत्यंत रोचक और सरस विधा पर भूमिका में रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी ने पर्याप्त जानकारी प्रदान की है । गद्य काव्य का स्वरूप धारे प्रकृति, परिवेश , यात्रा-वृत्तांत ,संस्मरण ,डायरी तथा अन्य विविध भावों की सरस चर्चा और फिर उन्ही भावों को पुष्ट करते एक या अनेक हाइकु ऐसा कलेवर लिये हाइबन का स्वरूप मनोमुग्धकारी है । पुस्तक के दो खण्डों में  से प्रथम में कवयित्री /लेखिका ने जीवन के मधुर-तिक्त अनुभवों को बेहद सरसता , सजीवता के साथ अभिव्यक्त किया है । वस्तुतः हाइबन का भाव-संसार, इसकी विषय-वस्तु बहुत व्यापक एवं गहन है ,जिस पर सुधा जी की समर्थ लेखनी ने पर्याप्त रस-वर्षण किया ।‘ सराय' अपनों की , अपने वक्त की निष्ठुरता को कहता है । ‘पाथर पंख’ विवशता की पराकाष्ठा है सुन्दर कामनाओं का विस्तृत संसार और पत्थर के पंख ... अब शिकायत करें भी तो किससे उसके सिवा -
            वाह रे ऊपर वाले ! तू भी बड़ा मज़ाक पसंद है ! नित नए कौतुक करना तेरी फ़ितरत में शामिल !
            आग का प्याला /धरती के होंठों से / लगा के हँसा ।
            उस आग को /धरती तो पी गई /तू खुद जला ।
       कपाल कुण्डला’ और ‘खण्डहर’ दुर्वह एकांत की घनीभूत पीड़ा हैं .... “बाहर आती तो कैसे ? रास्ता पाती तो क्यों कर ? वह खण्डहर तो खुद मेरा अपना था !!
बंजर धरा /डूब के तिनके को / तरस रही”
 दुःख चीता है’ पर  “ख़ुशी की हिरनी और दुःख का चीता” इतना कथन मात्र संवेदना के सागर को आलोड़ित करने में समर्थ है । ‘अर्चि का आचमन’ , ‘शोक-गीत’  जीवन के कटु सत्य से रूबरू / साक्षात्कार कराते हाइबन हैं । नैनीताल प्रवास, कुमायुँ प्रवास , नाज़ुक फ़ूलचुकी ,फिर आ गया चैत , कूकी थी पिकी और पोशाक जैसे हाइबन कवयित्री के प्रकृति के साथ तादात्म्य को द्योतित करते हैं ।मासूम फ़ाख्ता और ‘पोशाक’ की संवेदनात्मक दृष्टि .....
अरी ,तू पूरी बारिश में भीगती रही थी क्या ? घने पत्तों ने भी आसरा न दिया ? कुछ न बोली | उसके भीगे डैनों और भारी पंखों ने ही कहा –
तेरी तरह /कई जोड़ी पोशाक / नहीं है यहाँ |
पंछी के पास /बस एक पोशाक / गीली या सूखी |”
सिल्वर ओक की शाखाओं में फर-फर करती नन्ही चिड़िया का आना और जाना ..देखिए... “क्षिप्र गति पंखों की हलचल से सहसा पेड़ की टहनियाँ नींद से चौंक पड़ती हैं ,उसकी चंचलता को देख ,चकित-विस्मित..पलांश में गायब हो जाती .... यही जीवन है ?
आई चिरैया /टहनी मुस्कुरा दी /उड़ी ,उदास !
यात्रा वृत्तांत से जुड़े अन्य  हाइबनों में गोरखपुर , कुशीनगर और सात देवियों के दर्शन आध्यात्मिक  , दिव्य भावनाओं ,अनुभूतियों से परिवेष्टित हाइबन हैं । सुधा जी स्वयं कह उठती हैं-
            इतना सुख /सम्हाले न सम्भले /कहाँ सहेजूँ ?
पर्यावरण के प्रति सजगता यहाँ भी मुखर हुई है ।राजस्थान टूर पर कवयित्री अजमेर-पुष्कर जी की विगत और वर्तमान दशा पर तुलनात्मक चिंतन कर व्यथित हैं -
1976 में.. स्फटिक मणि/दूर तक फैला था /जल -विस्तार ।
और
2001 में... विनाश लीला /छिलके  ,पन्नी ,टोंटे /फैले पड़े हैं ।
      कर्मयोगी सूर्य उन्हें मोहित करता है...... “ सूरज तो सच्चा कर्मयोगी ....
पौ फटते ही / सूरज बुनकर /काम में लगा |
बुनता रहा /रौशनी के लिबास / सबके लिए |”
........तो साँझ की देहरी पर खड़ा सूरज अनकही कथा कहता है।  संगदिल मौसम के सितम मन दुखा जाते हैं , दूसरी ओर महकी सुबह में आश्वस्ति के स्वरों की मधुर गुनगुनाहट भी है - 
            उनका आना /खुशनुमा सुबह /महक उठी ।
     दूसरे खंड ‘मौसम बहुरंगी’ में कहना न होगा कि कवयित्री ने हाइकुओं के माध्यम से विविध ऋतुओं के लुभावने चित्र साकार किए हैं और मौसम के व्याज से बहुत कुछ कहा है-
            ठसक बैठी /पीला घाघरा फैला /रानी सरसों ।
            दर्पण देखे /फूलों के भार झुकी /नव-वल्लरी ।
            चैती गुलाब /खुशबू न समाए /हवा उड़ाए ।
            कली थी खिली /वैशाख -आँधी से /धूलि में मिली ।
दो युवा बेटी / धरती है बेचैन /’बाढ़’ व सूखा |
            लाल छाता ले /घूमती वन कन्या /जेठ मास में ।   ...और यह भी देखिए.....जो  केवल ऋतु वर्णन नहीं है ...
           शीत की मारी / पेट में घुटने दे / सोई है रात ।
            सूखी पत्तियाँ / चरमरा रही हैं / पाँवों के तले ।
अटल ध्रुव का परम सात्त्विक बिम्ब .........
            चमका ध्रुव  : /माँ की लौंग का हीरा /कौंध मारता |
            कहाँ तक कहूँ,एक से बढ़कर एक अनगिन मोहक चित्र उकेरे गए हैं ,जिनका आनंद पुस्तक पढ़कर ही ले पाना संभव है । डॉ•सुधा गुप्ता जी हिन्दी –जगत् में सार्थक हाइकु का पर्याय बन गई हैं। इनकी लेखनी से नि:सृत शब्द बोलते–बतियाते प्रतीत होते हैं। इसीलिए इनकी  भावानुवर्तिनी भाषा पुस्तक की सरसता को और अधिक बढ़ाने में पूर्णतया समर्थ है । पुस्तक के विषय में स्वयं सुधा जी ने कहा है-
            ये लफ्ज़ नहीं /सफ़र के छाले हैं / दर्द-रिसाले’
 हाइबन और हाइकु की मिली-जुली अनुभूतियों  वाले इस संग्रह के बारे में  मेरा इतना ही कहना है-
            कभी रागनी /कभी जीवन-कथा /साकार व्यथा ।
-0-


- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
H-604, प्रमुख हिल्स , छरवाडा रोड , वापी
जिला-वलसाड , गुजरात
396191

Friday, 25 May 2018

132 - एक अदा तो न्यारी रख !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा


1
भलमनसाहत भारी रख
थोड़ी दुनियादारी रख

ख्वाहिश कितनी सारी रख
बस उनमें मेयारी रख !


बोल न दे बेताब नज़र
सच, इतनी हुशियारी रख

कर देगा बर्बाद तुझे
दिल से कमतर यारी रख
कब लेने आ जाएँ वो 
तू अपनी तैयारी रख !

2
एक ग़ज़ल गरमी की ... J

यूँ गर्मी से यारी रख
कूलर की तैयारी रख

बिजली रानी चली गईं
पंखी प्यारी-प्यारी रख

फ्रिज के नखरे घने बढ़े
इक मिट्टी की झारी रख

खट्टी-मीठी सी अमियाँ
थोड़े आम अचारी रख

खरबूज़े ,तरबूज़ चखे
शरबत, लस्सी  जारी रख 

लू का साथी बना पना
छाता, एक सवारी रख

नरम धुले, सूती कपड़े
भरकर तू अलमारी रख

प्यारी-प्यारी बातों की
एक अदा तो न्यारी रख !


-ज्योत्स्ना शर्मा

२५-५-१८
( चित्र गूगल से साभार )

Wednesday, 2 May 2018

131 - आँगन का नीम



-डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 



पक्के से प्यार की
डाल गया बीम ,
झूम-झूम गायेगा
आँगन का नीम |

कच्ची निम्बोली
और सावन के गीत
साँसों में जाग गई 
नैहर की प्रीत
रीत ,रीत जाए न
आशा-असीम |

पिलखन और निमिया की
ठंडी सी छाँव
मन-पाखी ढूँढ़ फिरा
पहले सा गाँव
कड़वी दवाई दे
मीठा हकीम |

सपना सवेरे का
होगा साकार 
पाऊँगी फिर से मैं
साझा सा प्यार
अम्मा और बाबा
न होंगे तक़सीम|

झूम झूम गायेगा
आँगन का नीम |


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Saturday, 24 March 2018

130 दो मुक्तक !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

1
बस फूलों की राहें पाना ऐसे थे अरमान नहीं ,
मिलकर रहना साथ बड़ा सुख इस सच से अनजान नहीं 
आज शिकायत ख़ुद से हमको हर कोशिश नाकाम हुई ;
ग़ैरों से अपनापन पाना इतना भी आसान नहीं । ।
                                2
       उर्वर धरती में बोया है बीज कभी तो सरसेगा ,
       कोई मधुरिम गीत कभी तो मन को उनके परसेगा ।
       अपना हो या किसी और का दर्द यही फ़ितरत उसकी ;
       बसे नयन में या बादल में पानी है तो बरसेगा । ।   

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Wednesday, 7 March 2018

129 जीवन की संजीवनी !


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा


दुर्गा काली मात को पूजे सकल समाज 
फिर क्यों सबला को मिले, मर्दानी का ताज ।1

नारी बन नारायणी ,उठ कर सोच विचार ।
स्वयं शक्ति ,तेजस्विनी,रच उज्ज्वल संसार ।2

कभी सुखद -सी चंद्रिका ,कभी सुनहरी धूप ,
कुदरत ने तुझको रचा देकर रूप –अनूप ।।3

कोमलता शालीनता ,गहने हैं ,ले मान ।
लेकिन कर प्रतिकार अब मत सहना अपमान ।।4


कठपुतली बन कर रहूँ ,कब तक तेरे साथ ,
डोरी रख ले थाम कुछ, दे मेरे भी हाथ ।।5

पग-पग पर मिलते यहाँ ,दुःशासन उद्दण्ड,
बैठे हैं धृतराष्ट्र क्या , लिये हाथ में दण्ड ।।6

जीवन की संजीवनी , आप करे संघर्ष ।
देख दशा, तेरी दिशा , शोक करें या हर्ष ।।7

पिंजरे की मैना चकित,क्या भरती परवाज़ ।
कदम-कदम पर गिद्ध हैं ,आँख गड़ाए बाज़ ।।8

पावनता पाई नहीं ,जन -मन का विश्वास ।
सीता को भी  राम  से , भेंट मिला वनवास ।।9

फूल कली से कह गए ,रखना इतना मान ।
बिन देखे होती रहे ,खुशबू से पहचान ।।10

शीश चुनरिया सीख की ,मन में मधुरिम गीत ।
बाबुल तेरी लाडली ,कभी न भूले रीत ।। 11

बिटिया को समझाइए ,सही-गलत पहचान ।
मानव के भी वेश में ,मिलते हैं शैतान ।। 12

छुपकर तितली ने पढ़े ,सभी सुमन के पत्र।
सोच–समझ उड़ना सखी , वन,उपवन ,सर्वत्र।। 13

देख-देखकर हो गए , डर,शंका निर्मूल ।
रंग-बिरंगी तितलियाँ ,उड़ें फूल से फूल ।। 14

मिली राह में ज़िंदगी ,बड़े दिनों के बाद ।
कुछ मुट्ठी में बंद सी , कुछ लगती आज़ाद ।। 15

दिवस अठारह तक चला ,द्वापर में संग्राम ।
कलियुग में क्यों कर भला,लेता नहीं विराम ।। 16

बैठीं नैना मूँद कर ,गांधारी किस चाह ।
सच्ची जीवन संगिनी ,सही सुझाए राह ।। 17

पोर-पोर पीड़ा बसी ,अभी रहे चुपचाप।
क्षमा कभी खुद को भला, कर पाएँगें आप ।। 18

राजनीति चौसर बिछा ,खेल रही है द्यूत ।
शकुनि दे रहे मंत्रणा ,प्रज्ञा हुई अछूत ।। 19

कैसे हम उनको कहें ,स्वयं धर्म का रूप ।
रखें प्रिया को दाँव क्या ,मर्यादा अनुरूप ।। 20

कान्हा तब तुमने रखी ,द्रुपद सुता की लाज ।
घर-घर हों वीरांगना , दुर्गा, लक्ष्मी आज ।। 21

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