Thursday, 30 September 2021

164- भूले गले लगाना !


 

                  चंदा-सूरज

                मुट्ठी में बाँध लिए 

                सागर सारे

                पर्वत नाप लिए 

                अँधियारों पे

                विजय पा गए  हो

                उजालों में क्यूँ

                यूँ भरमा गए हो ?

                हवा, धूप भी

                दासियाँ हों तुम्हारी

                ममता नहीं

                स्वर्ण की आभ प्यारी

                ऊँचे भवन

                सारा सुख खजाना

                खुशियों भरे

                प्रीत के गीत गाना

                व्यर्थ ही तो हैं

                दे ही ना पाये जब

                माता-पिता को

                तुम दो वक्त खाना

                भूले गले लगाना ।


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)












163- क्या पूछो हो !

 



क्या पूछो हो ' याद हमारी आती है ' ?
आएगी क्या , दिल से कब ये जाती है

रौशन है लेकिन धुँधला सा दिखता है
इक बदली जब सूरज पर छा जाती है

मर्यादा में बहे तो नदिया अच्छी है
तोड़े जो तटबंध ,प्रलय फिर ढाती है

ख्वाहिश का संसार अगर छोटा रख लो
सच मानों फिर दुनिया बहुत सुहाती है

चलते-चलते गिर जाओ तो उठ जाओ
अक्सर ठोकर रस्ता सही दिखाती है 

तनिक सफलता पर खुश होना ठीक नहीं
बनते-बनते बात बिगड़ भी जाती है

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

(चित्र गूगल से साभार)

Monday, 12 July 2021

162-प्रेम की नदी

 



1
पंक में जन्मे
बन नहीं पाते हैं
पंकज सभी ।
2
न्याय की देवी
सबूतों , गवाहों के
वश में रही ।
3
बादल छाए
टर्राते हैं दादुर 

नाचेें मयूर ।

4

चंचल नदी

सागर से मिलके
हो गई शान्त ।
5
चंचल नदी
शान्त हुई ,आखिर-
सिंधु से मिल ।
6
जाती है मिट
यायावरी बूँद की
सिंधु से मिल ।
7
करते यहाँ
उगते सूरज को
नमन सभी ।
8
बही थी कभी
भरी-भरी जल से
प्रेम की नदी ।
9
नदी तो बही
उसके ही किनारे
मिले न कभी ।
10
चला न पता
वृक्ष पर छा गई
अमरलता ।

11

प्रभु की माया
कहीं कड़ी सी धूप
कहीं है छाया।
12
बड़ी , गहरी
झील में था शिकारा
एक , बेचारा !
13
भ्रमजाल में
फँस, छटपटाती
मन की मीन ।
14
खेल के ऊबा
माँगता रहे बच्चा
नया खिलौना ।
15
अठखेलियाँ
करे मीन जल में
दूर, तड़पे।
16
दूर रहते
पशु पहचानते
विषाक्त पत्ते ।
17
नहीं खेवैया
बहती जाती नैया
धारा के संग ।


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)




Friday, 28 May 2021

161-ताऊ जी












आज पढ़िएगा ....चारों ओर फैली बेचैनियों के बीच एक हल्की- फुल्की रचना - 


दिन भर कितना लाड़ लड़ाते ताऊ जी 

नई कहानी रोज़ सुनाते ताऊ जी ।


भूलें चाहे पापा जी टॉफ़ी लाना 

दूध जलेबी खूब खिलाते ताऊ जी ।


चाचा कहते पढ़ ले, पढ़ ले , ओ मोटी ! 

उनको अच्छे से धमकाते ताऊ जी ।


कठिन पढ़ाई जब भी मुझको दुखी करे 

बड़े प्यार से सब समझाते ताऊ जी ।


छीन खिलौने जब भी भागे है भैया

कान खींचकर उसको लाते ताऊ जी ।


माँ-पापा संग शहर में आई हूँ लेकिन

याद बहुत ही मुझको आते ताऊ जी।

('जय विजय' के मई, 21 अंक में)

Jyotsna Sharma

Monday, 24 May 2021

160-आँखों में सपनों की महफिल

 




छोड़ो भी अब तो नादानी
मत छेड़ो वह तान पुरानी।

उड़े न चिड़िया अमन-चैन की
डालो इसको दाना पानी।

प्रेम- मुहब्बत के रंगों से 

दुनिया की तस्वीर सजानी ।

ठान अगर तुम लोगे मन में
मुश्किल भी होगी आसानी ।

चोट बहुत पहुँचाया करती
ये अपनों की नाफ़रमानी ।

मिल जाएँगे जब दिल से दिल
बात बनेगी तब लासानी ।

आँखों में सपनों की महफिल
दिल में यादें ,दिलबर जानी !

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

(चित्र गूगल से साभार)




Friday, 9 April 2021

159- सारा आकाश !

 












मन में शोर
भागी है उठकर
नैनों से नींद ।1

****

पक्की दीवार
कीलों की फितरत
जाती है हार !2

****

ऊषा मगन
ले मोतियों के हार
करे शृंगार !3

****

थामो कमान
तरकश से तीर
स्वयं न चलें ।4

****

काव्य-कुसुम
प्रेम की सुगंध में
भीगे-से शब्द !5

****

रहे अछूता
विकट विकारों से
भाव-भवन ।6

****

उड़ी पतंग
नाच रही नभ में
डोर बँधी है ।7

****

फिक्र में जागे
नयनों में सपने
नहीं सजते ।8

****

दिया उसने
बाहों में भरकर
सारा आकाश ।9

****

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

Tuesday, 6 April 2021

158-किरणों की आहट

 


क्षणिकाएँ : डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

1
हैरान जंगल !
सालों-साल तो
बाज और भेड़ियों ने
अपना कानून चलाया
गिद्धों ने नोच-नोच खाया
इलज़ाम मोरों पर आया । 


2
अपमार्जक !
उदास हैं गिद्ध
कुछ कह नहीं पाते हैं !
कह सकते तो कहते-
ये मनुष्य
इलज़ाम हम पर क्यों
लगाते हैं
हमने कहाँ मारा
ज़िंदा प्राणियों को, 
हम तो मुर्दों को खाते हैं ! 


3
गरीबी, भूख,
फाक़ाकशी पर
क़ौम के आका
व्यवस्था से
इस क़दर गुस्सा खा गए
कि, बच्चों के हाथों में
बन्दूकें थमा गए ।


4
लो हो गया इन्साफ !
निर्दोष बरी भँवरा ,
उसका कोई दोष
नहीं पाया गया ।
धूर्त कलियों द्वारा
अपनी महक से
खुद ही लुभाया गया ,
पास बुलाया गया ।


5
कितनी अच्छी है वो !
मैं उससे .....
देर तक बतियाती रही
....और प्यारी तन्हाई
मेरी हाँ मे हाँ मिलाती रही ।


6
सुखद होता है
मित्रों से मिलना !
इसका
प्रमाण मिल गया
जब
किरणों की आहट से
फूलों का
चेहरा खिल गया....... 😊
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
( चित्र गूगल से साभार)